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US-Iran तनाव का भारत पर असर: कच्चा तेल $91 के पार, Sensex 493 अंक टूटा; महंगाई बढ़ने का खतरा

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने भारतीय बाजार को झटका दिया, Nifty लगातार छठे दिन गिरा; रुपये को संभालने के लिए RBI भी सक्रिय नई दिल्ली/मुंबई: अमेरिका और ईरान…

US-Iran तनाव का भारत पर असर: कच्चा तेल $91 के पार, Sensex 493 अंक टूटा; महंगाई बढ़ने का खतरा

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मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने भारतीय बाजार को झटका दिया, Nifty लगातार छठे दिन गिरा; रुपये को संभालने के लिए RBI भी सक्रिय नई दिल्ली/मुंबई: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर दिखाई देने लगा है। मंगलवार, 18 अगस्त 2026 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent crude की कीमत करीब 91 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने के बाद भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली बढ़ गई। कारोबार के अंत में BSE Sensex 0.63 प्रतिशत गिरकर 77,235.46 पर बंद हुआ, जबकि Nifty 50 करीब 0.55 प्रतिशत टूटकर 24,154.90 पर आ गया। Nifty में यह लगातार छठा गिरावट वाला कारोबारी सत्र रहा। आखिर अचानक क्यों महंगा हुआ कच्चा तेल? तेल की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष को खत्म करने की दिशा में चल रही कोशिशों को झटका लगा है। अस्थायी संघर्षविराम की व्यवस्था समाप्त होने और दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनने से तेल की सप्लाई को लेकर बाजार की चिंता बढ़ी है। इसके साथ Strait of Hormuz की स्थिति पर भी पूरी दुनिया की नजर है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां लंबे समय तक व्यवधान पैदा होने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। Brent Crude $91 के पार मंगलवार को Brent crude की कीमत 91 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई। अमेरिकी West Texas Intermediate यानी WTI भी करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा। तेल की कीमतों में लगातार तीसरे सत्र में बढ़ोतरी दर्ज की गई। यही तेजी भारत जैसे देशों के लिए चिंता की बात है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। Sensex करीब 493 अंक गिरा महंगे कच्चे तेल और वैश्विक अनिश्चितता का असर मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। Sensex करीब 493 अंक गिरकर 77,235.46 पर बंद हुआ। वहीं Nifty गिरकर 24,154.90 पर पहुंच गया। बाजार के 16 प्रमुख सेक्टरों में से 12 गिरावट के साथ बंद हुए। IT सेक्टर पर सबसे ज्यादा दबाव दिखाई दिया और इसमें करीब 1.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। लगातार छठे दिन गिरा Nifty भारतीय शेयर बाजार में पिछले कई दिनों से दबाव बना हुआ है। 17 अगस्त को भी Nifty गिरावट के साथ बंद हुआ था। सोमवार तक यह लगातार पांचवां गिरावट वाला सत्र था और मंगलवार की कमजोरी के बाद यह सिलसिला छठे दिन तक पहुंच गया। इस समय बाजार पर घरेलू कारणों से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर दिखाई दे रहा है। भारत के लिए महंगा तेल क्यों है बड़ी चिंता? भारत दुनिया के बड़े कच्चा तेल आयातक देशों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर देश का आयात खर्च बढ़ सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है। तेल आयात पर अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होने से रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने पर महंगाई की चिंता भी पैदा हो सकती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बढ़ते ही घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतें उसी अनुपात में तुरंत बढ़ जाएंगी। घरेलू ईंधन कीमतें कई अन्य कारकों और नीतिगत फैसलों पर भी निर्भर करती हैं। रुपये पर भी बढ़ा दबाव, RBI हुआ सक्रिय तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने के कारण भारतीय रुपये पर भी दबाव देखने को मिला। Reuters के मुताबिक मंगलवार को रुपया करीब 95.68 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। बाजार से जुड़े सूत्रों के अनुसार Reserve Bank of India ने रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए विभिन्न बाजारों में हस्तक्षेप किया। भारत को तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। इसलिए कच्चा तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग भी बढ़ सकती है। आम आदमी पर क्या पड़ सकता है असर? अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो इसका असर केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से माल ढुलाई महंगी हो सकती है। इसका असर सब्जी, फल, खाद्य सामग्री और दूसरी रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है। एयरलाइंस, पेंट, केमिकल, लॉजिस्टिक्स और कई दूसरे उद्योग भी तेल तथा इससे बनने वाले उत्पादों की कीमतों से प्रभावित होते हैं। लेकिन वास्तविक खुदरा महंगाई कितनी बढ़ेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल की कीमत कितने समय तक ऊंची रहती है और घरेलू स्तर पर सरकार तथा कंपनियां लागत को किस तरह संभालती हैं। निवेशकों की नजर अब Iran-US घटनाक्रम पर आने वाले दिनों में भारतीय शेयर बाजार के लिए अमेरिका-ईरान तनाव बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। अगर दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ती है और Hormuz से तेल आपूर्ति सामान्य रहने का भरोसा बढ़ता है तो crude oil की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इसके उलट तनाव बढ़ने और तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका मजबूत होने पर कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल महंगा कच्चा तेल + कमजोर रुपया + ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भारतीय बाजार के लिए तीन बड़े जोखिम बने हुए हैं। Seemanchal Live के पाठकों के लिए: कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि अगले दिन से पेट्रोल-डीजल उतना ही महंगा हो जाएगा। लेकिन अगर वैश्विक तेल कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो भारत के आयात बिल, महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है।

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