Education
बजट से आम आदमी को क्या लेना-देना और डिजिटल भारत का सफर
Published: 7/2/2026, 12:18:20 pm•20 views•Seemanchal Live
थाली, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य — बजट कैसे तय करता है सब कुछ? 1860 से डिजिटल भारत तक की पूरी कहानी लेखक: प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार हर साल 1 फरवरी को जब देश का बजट पेश होता है, तो यह सिर्फ सरकार की एक औपचारिक घोषणा नहीं होती। यह वह दिन होता है, जब देश की आर्थिक दिशा , सरकार की प्राथ

थाली, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य — बजट कैसे तय करता है सब कुछ?
1860 से डिजिटल भारत तक की पूरी कहानी लेखक: प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार हर साल 1 फरवरी को जब देश का बजट पेश होता है, तो यह सिर्फ सरकार की एक औपचारिक घोषणा नहीं होती।
यह वह दिन होता है, जब देश की आर्थिक दिशा , सरकार की प्राथमिकताएं और आम आदमी की उम्मीदें एक साथ सामने आती हैं।
बजट से पहले ही खबरें बनने लगती हैं—किस सेक्टर को कितना मिलेगा, क्या सस्ता होगा, क्या महंगा होगा, नौकरी के मौके बढ़ेंगे या नहीं।
हालात ऐसे होते हैं कि हम अपने निजी फैसले भी बजट के हिसाब से टालने-बदलने लगते हैं।
इसी बजट चर्चा के बीच एक मासूम सवाल अक्सर सबको सोचने पर मजबूर कर देता है— बजट आखिर है क्या और इससे हमारा क्या लेना-देना?
जब बच्चों की पढ़ाई, घर की रसोई, इलाज, नौकरी और मोबाइल-इंटरनेट सब कुछ बजट से जुड़ा है, तब यह सवाल हर आम नागरिक का सवाल बन जाता है।
बजट क्या है, आसान शब्दों में बजट सरकार का सालाना हिसाब-किताब होता है।
इसमें सरकार बताती है कि वह एक साल में कितना पैसा कमाएगी और कहां-कहां खर्च करेगी ।
शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रेलवे, रक्षा, खेती, डिजिटल योजनाएं—हर क्षेत्र का भविष्य इसी दस्तावेज से तय होता है।
इसलिए बजट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी का रोडमैप होता है।
79 साल की आज़ादी में 93वां बजट कैसे?
यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है।
दरअसल, भारत में कुछ वर्षों में एक ही साल में दो बजट भी पेश हुए हैं— अंतरिम बजट : चुनावी साल में पूर्ण बजट : नई सरकार बनने के बाद इसके अलावा कुछ खास परिस्थितियों में अतिरिक्त बजट भी आए।
इसी वजह से अब तक भारत में 73 पूर्ण बजट, 15 अंतरिम बजट और 4 अतिरिक्त बजट पेश किए जा चुके हैं।
1 फरवरी 2026 को देश का 93वां केंद्रीय बजट पेश हुआ।
आज़ाद भारत का पहला बजट भारत आज़ाद होने के सिर्फ तीन महीने बाद, 26 नवंबर 1947 को देश का पहला बजट पेश किया गया था।
इसे तत्कालीन वित्त मंत्री आर. के. शनमुखम चेट्टी ने संसद में रखा।
यह एक अंतरिम बजट था, जिसमें सीमित संसाधनों, बंटवारे की पीड़ा और भविष्य की बड़ी जिम्मेदारियों की झलक साफ दिखती थी।
क्या अंग्रेजों के समय भी बजट आता था?
हां।
भारत में बजट की परंपरा ब्रिटिश काल से शुरू हुई थी।
साल 1860 में स्कॉटिश अर्थशास्त्री जेम्स विल्सन ने पहला बजट पेश किया और उसी समय आयकर की नींव रखी गई।
फर्क सिर्फ इतना था कि तब बजट भारत के विकास के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन की जरूरतों और टैक्स वसूली के लिए बनाया जाता था।
बजट कैसे बनता है?
बजट एक दिन में नहीं बनता।
इसकी प्रक्रिया करीब छह महीने पहले शुरू हो जाती है।
सभी मंत्रालय अपनी जरूरतें भेजते हैं खर्च और आमदनी का अनुमान लगाया जाता है विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों, किसान-उद्योग संगठनों से राय ली जाती है अंत में कैबिनेट की मंजूरी के बाद बजट संसद में पेश किया जाता है यही वजह है कि बजट एक सामूहिक सोच और योजना का नतीजा होता है।
बजट से आम आदमी का सीधा रिश्ता बजट का असर सीधा हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है— कमाई और टैक्स : सैलरी में कितना बचेगा, कितना टैक्स जाएगा महंगाई : दाल-चावल, दूध, गैस, पेट्रोल, मोबाइल बच्चों की पढ़ाई : स्कूल, कॉलेज, स्कॉलरशिप इलाज : सरकारी अस्पताल, दवाइयां, हेल्थ स्कीम रोजगार : नई योजनाएं, नई नौकरियां सड़क-बिजली-पानी : गांव से शहर तक बुनियादी सुविधाएं यानी बजट सरकार का कागज है, लेकिन असर सीधा आपकी जेब और भविष्य पर पड़ता है।
बजट और डिजिटल भारत का सफर आज का भारत सिर्फ खेती और उद्योग तक सीमित नहीं है।
डिजिटल भारत बजट की सबसे बड़ी देन बन चुका है।
ऑनलाइन शिक्षा डिजिटल भुगतान सरकारी सेवाएं मोबाइल पर गांव-गांव इंटरनेट इन सबके पीछे बजट का ही पैसा और योजना काम करती है।
1860 के टैक्स सिस्टम से लेकर आज के पेपरलेस बजट और डिजिटल इंडिया तक का सफर इसी बदलाव की कहानी है।
निष्कर्ष बजट कोई दूर की चीज नहीं है।
यह आपकी थाली , बच्चों की पढ़ाई , नौकरी , इलाज और डिजिटल भविष्य से सीधा जुड़ा हुआ है।
इसलिए बजट को समझना हर नागरिक के लिए जरूरी है।
जब हम बजट समझते हैं, तभी हम देश की दिशा और अपनी भूमिका को भी बेहतर तरीके से समझ पाते हैं।
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