31 दिसंबर : महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी के पंजीयन के लिए फरमान जारी किया, जो भारत के औपनिवेशिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है।
इतिहास में 31 दिसंबर का विशेष महत्व
31 दिसंबर की तारीख भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है। इसी दिन वर्ष 1600 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने एक ऐतिहासिक फरमान जारी कर ईस्ट इंडिया कंपनी के पंजीयन को मंजूरी दी थी। यह फरमान आगे चलकर भारत के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक इतिहास को गहराई से प्रभावित करने वाला साबित हुआ।
यह वही कंपनी थी, जिसने व्यापार के बहाने भारत में कदम रखा और धीरे-धीरे पूरे उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश शासन की नींव रख दी।
महारानी एलिजाबेथ प्रथम का ऐतिहासिक आदेश
31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने एक शाही चार्टर (Royal Charter) जारी किया। इस फरमान के जरिए:
-
ईस्ट इंडिया कंपनी को
-
पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत
-
के साथ व्यापार करने का एकाधिकार अधिकार
दिया गया।
यह कंपनी औपचारिक रूप से “द गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इनटू द ईस्ट इंडीज” के नाम से पंजीकृत हुई।
मसालों के व्यापार ने बदली दुनिया की राजनीति
उस दौर में मसाले—जैसे काली मिर्च, दालचीनी, जायफल और लौंग—सोने से भी ज्यादा कीमती माने जाते थे।
मसालों के व्यापार पर उस समय:
-
🇪🇸 स्पेन
-
🇵🇹 पुर्तगाल
का वर्चस्व था।
इंग्लैंड इन शक्तियों को चुनौती देना चाहता था, और इसी रणनीति के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई।
व्यापार से सत्ता तक का सफर
शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी केवल व्यापारिक उद्देश्य से भारत आई थी। कंपनी ने:
-
सूरत
-
मद्रास (चेन्नई)
-
बॉम्बे (मुंबई)
-
कलकत्ता (कोलकाता)
जैसे बंदरगाहों पर अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किए।
लेकिन धीरे-धीरे कंपनी ने:
-
स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप
-
सैन्य शक्ति का निर्माण
-
राजाओं के बीच फूट का फायदा
उठाकर अपना प्रभाव बढ़ाया।
प्लासी की लड़ाई और सत्ता की शुरुआत
1757 में प्लासी की लड़ाई ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए निर्णायक साबित हुई।
इस जीत के बाद कंपनी केवल व्यापारी संस्था नहीं रही, बल्कि:
➡️ भारत में राजनीतिक सत्ता का केंद्र बन गई।
इसके बाद बंगाल, बिहार और उड़ीसा जैसे क्षेत्रों पर कंपनी का नियंत्रण स्थापित हुआ।
भारत पर ब्रिटिश शासन की नींव
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में:
-
भारी कर व्यवस्था
-
भारतीय उद्योगों का पतन
-
किसानों का शोषण
-
प्रशासनिक बदलाव
जैसी नीतियां लागू की गईं।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश सरकार ने कंपनी को भंग कर सीधे भारत का शासन अपने हाथ में ले लिया।
भारत के इतिहास में 31 दिसंबर का महत्व
इस तरह 31 दिसंबर सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि:
-
भारत में औपनिवेशिक शासन की शुरुआत
-
ब्रिटिश सत्ता की नींव
-
भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की पृष्ठभूमि
से जुड़ा हुआ दिन है।
यह तारीख हमें याद दिलाती है कि किस तरह एक व्यापारिक कंपनी ने पूरे देश की तकदीर बदल दी।
इतिहास से मिलने वाली सीख
इतिहासकारों के अनुसार, ईस्ट इंडिया कंपनी की कहानी यह सिखाती है कि:
-
आर्थिक ताकत कैसे राजनीतिक शक्ति में बदल सकती है
-
विदेशी हस्तक्षेप के परिणाम कितने दूरगामी हो सकते हैं
-
एकजुटता की कमी कैसे गुलामी का कारण बन सकती है
Today in History: 31 December
31 दिसंबर का दिन न केवल नए साल की पूर्व संध्या है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के सबसे निर्णायक अध्यायों में से एक की शुरुआत का प्रतीक भी है।
❓ ईस्ट इंडिया कंपनी का पंजीयन कब हुआ?
31 दिसंबर 1600 को।
❓ किसने ईस्ट इंडिया कंपनी को पंजीकृत किया?
इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने।
❓ शुरुआत में कंपनी का उद्देश्य क्या था?
पूर्वी एशिया और भारत के साथ व्यापार करना।
ईस्ट इंडिया कंपनी के गठन ने न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और व्यापार प्रणाली को बदल दिया। यह घटना हमें यह भी सिखाती है कि आर्थिक शक्ति किस प्रकार राजनीतिक प्रभुत्व में परिवर्तित हो सकती है। 31 दिसंबर का यह ऐतिहासिक दिन भारतीय इतिहास में विदेशी शासन की शुरुआत का प्रतीक बन गया।



