प्रसिद्ध बंगाली लेखक ‘शंकर’ का 93 वर्ष की उम्र में निधन, साहित्य जगत में शोक की लहर
कोलकाता: प्रसिद्ध बंगाली लेखक मणि शंकर मुखोपाध्याय, जिन्हें साहित्य जगत में ‘शंकर’ के नाम से जाना जाता था, का शुक्रवार को 93 वर्ष की आयु में कोलकाता के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन से साहित्य जगत में गहरा शोक व्याप्त है और देशभर के साहित्यकारों, पाठकों और बुद्धिजीवियों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय साहित्य ने एक महान रचनाकार को खो दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने दी श्रद्धांजलि
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि शंकर बंगाली साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण हस्ती थे। उन्होंने अपने शब्दों के माध्यम से समाज, जीवन और मानवीय भावनाओं को बड़ी संवेदनशीलता और गहराई से प्रस्तुत किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी रचनाओं ने कई पीढ़ियों के पाठकों को प्रभावित किया और भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाया। उन्होंने शोक संतप्त परिवार, मित्रों और उनके पाठकों के प्रति संवेदना व्यक्त की।
समृद्ध साहित्यिक यात्रा
मणि शंकर मुखोपाध्याय का जन्म 7 दिसंबर 1933 को हुआ था। उन्होंने अपने लंबे साहित्यिक जीवन में बंगाली भाषा में अनेक कालजयी रचनाएं दीं। वे शहरी जीवन की जटिलताओं, सामाजिक बदलाव, नैतिक द्वंद्व और मानवीय संघर्षों को अत्यंत प्रभावी ढंग से चित्रित करने के लिए जाने जाते थे।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘चौरंगी’, ‘सीमाबद्ध’, ‘जनअरण्य’, ‘कतो अजाना’ और ‘एक एका एकाशी’ जैसी प्रसिद्ध रचनाएं शामिल हैं। इन कृतियों ने उन्हें साहित्य जगत में एक विशिष्ट पहचान दिलाई और वे आम पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय रहे।
सिनेमा पर भी रहा गहरा प्रभाव
शंकर की रचनाओं का प्रभाव केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय सिनेमा पर भी इसका व्यापक असर पड़ा। उनकी कई कृतियों पर फिल्में बनाई गईं, जिन्हें दर्शकों और समीक्षकों से काफी सराहना मिली।
‘चौरंगी’ का फिल्म रूपांतरण विशेष रूप से चर्चित रहा, जबकि ‘सीमाबद्ध’ और ‘जनअरण्य’ जैसी कृतियों पर आधारित फिल्मों ने भी उनकी रचनात्मक दृष्टि को व्यापक पहचान दिलाई। इन फिल्मों के माध्यम से उनकी कहानियां बड़े पर्दे पर भी जीवंत हो उठीं।
पुरस्कार और लेखन की विशेषता
लगभग सात दशकों के अपने लेखन जीवन में शंकर ने उपन्यास, कहानी संग्रह, संस्मरण और निबंध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। वर्ष 2020 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनकी साहित्यिक उपलब्धियों का प्रमाण है।
उनकी लेखनी व्यंग्य, हास्य और गहन मानवीय संवेदना के संतुलित मिश्रण के लिए जानी जाती थी। उन्होंने खास तौर पर शहरी मध्यम वर्ग के जीवन, संघर्ष, महत्वाकांक्षा और सामाजिक दबावों को बड़ी सजीवता से प्रस्तुत किया।
साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति
मणि शंकर मुखोपाध्याय का निधन भारतीय साहित्य के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है। उनके लेखन ने न केवल बंगाली साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय भाषाओं के साहित्य को भी नई दिशा दी।
उनकी रचनाएं आज भी पाठकों के बीच उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं। आने वाली पीढ़ियां भी उनके साहित्य से प्रेरणा लेती रहेंगी।



