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India

मिलावट और खराब भोजन के खिलाफ देशव्यापी अभियान तेज, हजारों खाद्य लाइसेंस पर हुई कार्रवाई

भारत में मिलावटी और असुरक्षित खाद्य पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी गई है। खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिकारी छोटे भोजनालयों से लेकर बड़े रेस्तरां, खाद्य…

मिलावट और खराब भोजन के खिलाफ देशव्यापी अभियान तेज, हजारों खाद्य लाइसेंस पर हुई कार्रवाई

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भारत में मिलावटी और असुरक्षित खाद्य पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी गई है। खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिकारी छोटे भोजनालयों से लेकर बड़े रेस्तरां, खाद्य उत्पादक इकाइयों और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों तक की जांच कर रहे हैं। नियमों का पालन नहीं करने वाले हजारों प्रतिष्ठानों के खाद्य लाइसेंस रद्द या निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई है। कई जगह छापेमारी के दौरान गंदगी, गलत लेबलिंग और खराब गुणवत्ता वाली सामग्री के मामले मिले हैं।

इस अभियान का उद्देश्य देश में बिकने वाले भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा में सुधार करना है। भारत में सड़क किनारे मिलने वाले भोजन से लेकर पैकेटबंद खाद्य पदार्थों तक का बहुत बड़ा बाजार है। करोड़ों लोग प्रतिदिन बाहर बना खाना खाते या बाजार से तैयार उत्पाद खरीदते हैं। ऐसी स्थिति में भोजन की गुणवत्ता में छोटी सी लापरवाही भी बड़ी आबादी के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की जांच में प्रतिष्ठानों की स्वच्छता, कच्चे माल की गुणवत्ता, सामग्री को रखने का तरीका और उत्पाद पर लिखी जानकारी की पड़ताल की जाती है। यह भी देखा जाता है कि खाद्य सामग्री निर्धारित तापमान पर रखी गई है या नहीं। रसोई में साफ पानी, कर्मचारियों के लिए स्वच्छ कपड़े, कीट नियंत्रण और कचरे के सुरक्षित निपटारे की व्यवस्था भी खाद्य सुरक्षा का हिस्सा है।

गलत लेबलिंग के मामलों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। किसी उत्पाद को प्राकृतिक, शुद्ध, स्वास्थ्यवर्धक या निर्यात गुणवत्ता वाला बताने से पहले कंपनी के पास उस दावे का ठोस आधार होना चाहिए। यदि पैकेट पर लिखी जानकारी वास्तविक सामग्री से मेल नहीं खाती तो उपभोक्ता के साथ धोखा होने के साथ स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी पैदा हो सकता है।

मिलावट की समस्या भारतीय बाजार में लंबे समय से मौजूद है। दूध में पानी या हानिकारक पदार्थ मिलाने से लेकर मसालों में कृत्रिम रंग, घी और तेल में सस्ते विकल्प तथा मिठाइयों में खराब सामग्री के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आती रहती हैं। त्योहारों के समय मांग बढ़ने पर मिलावट का खतरा और बढ़ जाता है। ऐसी सामग्री का लंबे समय तक सेवन शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

नए अभियान में केवल बिना लाइसेंस वाले छोटे प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना पर्याप्त नहीं होगा। बड़े ब्रांड और संगठित कंपनियां लाखों उपभोक्ताओं तक अपने उत्पाद पहुंचाती हैं। इसलिए उनके लिए भी गुणवत्ता, लेबलिंग और विज्ञापन के समान रूप से सख्त नियम लागू होने चाहिए। कार्रवाई पारदर्शी होनी चाहिए ताकि छोटे दुकानदारों पर अनावश्यक दबाव न पड़े और प्रभावशाली कंपनियां जांच से बच न सकें।

पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर चीनी, नमक और वसा की अधिक मात्रा को लेकर सामने की तरफ स्पष्ट चेतावनी लिखने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। अभी ज्यादातर उत्पादों पर पोषण संबंधी विवरण पीछे की तरफ छोटे अक्षरों में दिया जाता है। सामान्य उपभोक्ता के लिए उसे पढ़ना और समझना कठिन होता है। सामने स्पष्ट चेतावनी होने से खरीदारी के समय बेहतर विकल्प चुनने में सहायता मिल सकती है।

भारत में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोग जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। अत्यधिक चीनी, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा वाले उत्पादों का नियमित सेवन इन बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकता है। खासकर बच्चों को आकर्षित करने के लिए रंगीन पैकेट, खिलौने और लोकप्रिय हस्तियों वाले विज्ञापन इस्तेमाल किए जाते हैं। ऐसे में अभिभावकों को उत्पाद के वास्तविक पोषण स्तर की स्पष्ट जानकारी मिलना आवश्यक है।

खाद्य उद्योग के एक वर्ग का तर्क है कि बहुत कठोर मानक लागू करने से कई सामान्य उत्पाद भी चेतावनी वाली श्रेणी में आ जाएंगे। इससे कारोबार और रोजगार प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मानकों को कमजोर रखने से चेतावनी व्यवस्था का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। उपभोक्ता के स्वास्थ्य और उद्योग की व्यावहारिक समस्याओं के बीच संतुलन बनाना नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है।

खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रस्तावित चेतावनी मानकों पर 10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में विचार होने की संभावना है। अदालत के सामने यह प्रश्न महत्वपूर्ण रहेगा कि पैकेट पर दी जाने वाली जानकारी कितनी स्पष्ट और अनिवार्य होनी चाहिए। इस मामले का असर देश के विशाल पैकेटबंद खाद्य उद्योग और करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

केवल लाइसेंस रद्द करने से खाद्य सुरक्षा की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। नियमित जांच, नमूनों की प्रयोगशाला में समय पर जांच और दोषी प्रतिष्ठानों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई जरूरी है। यदि जांच रिपोर्ट आने में महीनों लग जाए या जुर्माना बहुत कम हो तो नियम तोड़ने वालों में भय पैदा नहीं होगा। स्थानीय खाद्य प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने और पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित अधिकारियों की नियुक्ति भी आवश्यक है।

पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज जैसे सीमांचल के शहरों में तेजी से रेस्तरां, होटल और स्ट्रीट फूड का कारोबार बढ़ा है। ग्रामीण हाटों तथा स्थानीय बाजारों में भी पैकेटबंद खाद्य उत्पाद बड़ी मात्रा में बिकते हैं। सीमांचल में खाद्य सुरक्षा विभाग को दूध, मिठाई, मसाले, तेल, पानी और बच्चों द्वारा खाए जाने वाले उत्पादों की नियमित जांच करनी चाहिए।

स्थानीय दुकानदारों और छोटे भोजनालय संचालकों को केवल दंड देने के बजाय उन्हें स्वच्छता के नियमों का प्रशिक्षण देना भी जरूरी है। कई छोटे व्यवसायी नियमों और लाइसेंस की प्रक्रिया को पूरी तरह नहीं समझते। सरल पंजीकरण, प्रशिक्षण और सुधार का अवसर देकर उन्हें सुरक्षित खाद्य व्यवस्था का हिस्सा बनाया जा सकता है। जानबूझकर मिलावट करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई अलग से होनी चाहिए।

उपभोक्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सामान खरीदते समय निर्माण और समाप्ति की तारीख, पैकेट की स्थिति तथा खाद्य लाइसेंस संख्या देखनी चाहिए। खुली सामग्री में असामान्य रंग, गंध या स्वाद होने पर उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। किसी होटल या दुकान में गंभीर गंदगी दिखे तो खाद्य सुरक्षा विभाग को शिकायत की जा सकती है।

मिलावट और असुरक्षित भोजन के खिलाफ शुरू हुई कार्रवाई सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन यह अभियान तभी प्रभावी होगा जब जांच निष्पक्ष हो, नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और कार्रवाई लगातार जारी रहे। सुरक्षित भोजन कोई सुविधा नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। सरकार, कारोबारियों और उपभोक्ताओं की साझा जिम्मेदारी से ही देश की भोजन व्यवस्था को वास्तव में सुरक्षित बनाया जा सकता है।

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