नेपाल में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। कई बस्तियां पानी और मलबे की चपेट में आ गई हैं, जबकि सड़क, बिजली और संचार व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा है। बड़ी संख्या में लोगों की मौत और हजारों के लापता होने की सूचना है। राहत एजेंसियां प्रभावित क्षेत्रों में तलाश एवं बचाव अभियान चला रही हैं, लेकिन खराब मौसम और क्षतिग्रस्त रास्तों के कारण दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचना कठिन बना हुआ है।
आकाशवाणी समाचार की नवीनतम रिपोर्ट में नेपाल में मृतकों की संख्या 1,344 और लगभग पांच हजार लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई है। बचाव दल अब तक 13 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाल चुके हैं। आपदा का दायरा बड़ा होने और कई क्षेत्रों का संपर्क टूटने के कारण हताहतों की संख्या में बदलाव संभव है। इसलिए स्थानीय प्रशासन और नेपाल की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसियों द्वारा जारी आधिकारिक सूचनाओं पर लगातार नजर रखी जा रही है।
बाढ़ का सबसे गंभीर प्रभाव उन इलाकों में दिखाई दे रहा है जहां तेज बहाव अपने साथ मिट्टी, पत्थर और पेड़ों को लेकर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचा। कई घर पूरी तरह मलबे में दब गए हैं। कुछ स्थानों पर सड़कें बहने से गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से टूट गया है। पुलों और बिजली के खंभों को नुकसान पहुंचने के कारण राहत सामग्री पहुंचाने में भी बाधा आ रही है।
आपदा के कई दिनों बाद भी जीवित लोगों के मिलने की खबरें राहत दलों की उम्मीद बनाए हुए हैं। नुवाकोट जिले में मलबे के नीचे फंसी एक 60 वर्षीय महिला को करीब दस दिनों बाद जीवित निकालने की जानकारी सामने आई है। इस घटना ने कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे बचावकर्मियों का उत्साह बढ़ाया है। हालांकि लापता लोगों की बड़ी संख्या के कारण खोज अभियान लंबा चलने की आशंका है।
नेपाल सरकार के साथ सेना, पुलिस, स्थानीय स्वयंसेवक और राहत संगठन अभियान में जुटे हैं। हेलीकॉप्टरों की सहायता से उन क्षेत्रों तक भोजन, पानी और दवाइयां पहुंचाने की कोशिश की जा रही है जहां सड़क मार्ग बंद हैं। राहत शिविरों में विस्थापित परिवारों के लिए अस्थायी आश्रय बनाए गए हैं। बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों को प्राथमिकता के आधार पर सहायता देने की आवश्यकता है।
बाढ़ के बाद नेपाल के सामने स्वास्थ्य संबंधी संकट भी खड़ा हो सकता है। पेयजल स्रोत दूषित होने से डायरिया, हैजा, टाइफाइड और त्वचा से जुड़ी बीमारियां फैलने का खतरा है। जलजमाव वाले क्षेत्रों में मच्छरों का प्रकोप बढ़ सकता है। राहत शिविरों में साफ पानी, शौचालय, महिला स्वच्छता सामग्री और नियमित स्वास्थ्य जांच उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती होगी।
नेपाल में आई यह आपदा भारत, विशेष रूप से बिहार और सीमांचल के लिए भी महत्वपूर्ण है। नेपाल के पर्वतीय एवं तराई क्षेत्रों से निकलने वाली कई नदियां बिहार में प्रवेश करती हैं। ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश होने पर इन नदियों का पानी तेजी से नीचे की ओर बढ़ता है। इसके कारण सीमांचल के पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और कटिहार जिलों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
महानंदा, कनकई, परमान, बकरा और दूसरी नदियों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए अगले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं। नेपाल से आने वाले पानी और स्थानीय बारिश का संयुक्त प्रभाव नदी के जलस्तर को तेजी से बदल सकता है। निचले इलाकों, तटबंधों और कटाव प्रभावित गांवों में प्रशासन को लगातार निगरानी रखनी होगी। नदी के जलस्तर से संबंधित सूचना समय पर पंचायतों और ग्रामीणों तक पहुंचाना भी जरूरी है।
किशनगंज और अररिया के सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत-नेपाल के बीच दैनिक आवाजाही होती है। नेपाल में सड़क और पुल क्षतिग्रस्त होने का असर सीमा व्यापार तथा स्थानीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होने से सीमावर्ती कस्बों में कीमतें बढ़ने की आशंका रहती है। दोनों देशों के स्थानीय प्रशासन के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान राहत कार्य और बाढ़ प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण होगा।
सीमांचल में प्रशासन को संभावित खतरे को देखते हुए नावों, गोताखोरों, राहत शिविरों और मेडिकल टीमों को तैयार रखना चाहिए। जिन गांवों का संपर्क अक्सर बाढ़ में टूट जाता है, वहां पहले से सूखा राशन, पेयजल और जरूरी दवाइयां पहुंचाने पर विचार किया जाना चाहिए। तटबंधों की कमजोर जगहों की पहचान कर चौबीस घंटे निगरानी की व्यवस्था भी आवश्यक है।
स्थानीय लोगों को नदियों के बढ़ते पानी को देखने के लिए किनारों पर जाने से बचना चाहिए। तेज बहाव वाली पुलिया या सड़क पार करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। प्रशासन की ओर से निकासी का निर्देश मिलने पर घर छोड़ने में देरी जानलेवा साबित हो सकती है। जरूरी दस्तावेज, दवाइयां, बच्चों का सामान और कुछ सूखा भोजन पहले से सुरक्षित रखना उपयोगी होगा।
नेपाल की त्रासदी यह भी दिखाती है कि हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग कितना जरूरी है। भारत और नेपाल के बीच नदियों के जलस्तर, बारिश और बांधों से जुड़े आंकड़ों का तत्काल आदान-प्रदान सीमावर्ती जिलों को तैयारी के लिए अतिरिक्त समय दे सकता है। आधुनिक चेतावनी प्रणाली से हजारों लोगों की जान और संपत्ति बचाई जा सकती है।
इस समय नेपाल की प्राथमिकता लापता लोगों की तलाश, घायलों का उपचार और विस्थापित परिवारों तक राहत पहुंचाना है। वहीं बिहार और सीमांचल को इस आपदा से जुड़े संभावित जल प्रभाव के लिए सतर्क रहना होगा। सीमा के दोनों ओर समय पर चेतावनी, प्रशासनिक समन्वय और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही आने वाले खतरे को कम करने का सबसे प्रभावी रास्ता है।












