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SCO Summit में मोदी की एंट्री पर दुनिया की नजर: एक ही मंच पर भारत, चीन, पाकिस्तान और रूस—आतंकवाद से लेकर सीमा विवाद तक क्यों अहम है बिश्केक की बैठक?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SCO शिखर सम्मेलन के लिए किर्गिस्तान पहुंचे; शी जिनपिंग, पुतिन और शहबाज शरीफ समेत कई नेताओं की मौजूदगी से बढ़ा कूटनीतिक महत्व,…

SCO Summit में मोदी की एंट्री पर दुनिया की नजर: एक ही मंच पर भारत, चीन, पाकिस्तान और रूस—आतंकवाद से लेकर सीमा विवाद तक क्यों अहम है बिश्केक की बैठक?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SCO शिखर सम्मेलन के लिए किर्गिस्तान पहुंचे; शी जिनपिंग, पुतिन और शहबाज शरीफ समेत कई नेताओं की मौजूदगी से बढ़ा कूटनीतिक महत्व, भारत के लिए सुरक्षा और आतंकवाद सबसे बड़े मुद्दों में नई दिल्ली/बिश्केक, 29 अगस्त 2026: दुनिया की राजनीति में इस समय कई मोर्चों पर तनाव है—रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की अस्थिरता, भारत-चीन सीमा विवाद और आतंकवाद पर भारत-पाकिस्तान के बीच गहरे मतभेद। ऐसे माहौल में Shanghai Cooperation Organisation (SCO) Summit के लिए दुनिया के कई बड़े नेता किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में एक मंच पर जुट रहे हैं। भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सहित SCO देशों के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी के कारण यह बैठक सामान्य diplomatic gathering से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने यात्रा से पहले अपने संदेश में स्पष्ट किया कि भारत SCO के भीतर सुरक्षा, connectivity, trade और people-to-people relations को महत्वपूर्ण मानता है। साथ ही उन्होंने terrorism, separatism और extremism के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया। यानी इस सम्मेलन में भारत की प्राथमिकता केवल आर्थिक सहयोग नहीं होगी। सबसे बड़ा संदेश सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर रहने वाला है। आखिर SCO है क्या? SCO यानी Shanghai Cooperation Organisation की शुरुआत 2001 में हुई थी। शुरुआत में चीन, रूस और मध्य एशिया के देशों के बीच security और regional cooperation इसका मुख्य उद्देश्य था। बाद में संगठन का विस्तार हुआ और भारत तथा पाकिस्तान 2017 में इसके पूर्ण सदस्य बने। आज SCO में भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान और मध्य एशिया के कई महत्वपूर्ण देश शामिल हैं। इस संगठन की सबसे दिलचस्प बात यही है कि इसमें ऐसे देश एक साथ बैठते हैं जिनके आपसी रिश्ते हमेशा आसान नहीं रहे। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से तनाव है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद मौजूद है। चीन और रूस की पश्चिमी देशों से strategic rivalry है। फिर भी ये देश SCO के मंच पर regional security और economic cooperation पर बातचीत करते हैं। भारत के लिए सबसे बड़ा मुद्दा—आतंकवाद भारत लंबे समय से SCO जैसे international forums पर cross-border terrorism का मुद्दा उठाता रहा है। नई दिल्ली का रुख रहा है कि आतंकवाद को “अच्छा” और “बुरा” आतंकवाद जैसी श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा से पहले जारी संदेश में terrorism, separatism और extremism का स्पष्ट उल्लेख महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत के लिए यह संदेश सीधे पाकिस्तान से जोड़कर भी देखा जाएगा। नई दिल्ली लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान की जमीन से भारत विरोधी आतंकी संगठन संचालित होते हैं। पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार करता रहा है। SCO की मुश्किल यही है—संगठन terrorism के खिलाफ cooperation की बात करता है, लेकिन उसके दो सदस्य भारत और पाकिस्तान आतंकवाद की परिभाषा और जिम्मेदारी पर एक-दूसरे से गंभीर रूप से असहमत हैं। मोदी और शी जिनपिंग पर सबसे ज्यादा नजर Summit में सबसे अधिक ध्यान भारत और चीन के नेताओं की interactions पर रहने की संभावना है। भारत-चीन संबंध पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद के कारण गंभीर तनाव से गुजरे हैं। 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के संबंध कई दशकों के सबसे कठिन दौर में पहुंच गए थे। हालांकि military और diplomatic स्तर पर लगातार बातचीत के बाद कुछ friction points पर disengagement हुआ है। अब सवाल यह है कि क्या सीमा पर तनाव कम होने के बाद दोनों देश अपने आर्थिक और diplomatic संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य दिशा में ले जा सकते हैं। SCO जैसा मंच इसके लिए उपयोगी हो सकता है क्योंकि यहां दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व को बिना अलग bilateral summit आयोजित किए बातचीत का अवसर मिलता है। सीमा विवाद पर नई हलचल इस summit से ठीक पहले भारत और चीन के बीच boundary talks को आगे बढ़ाने को लेकर भी सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। दोनों पक्ष सीमा पर शांति बनाए रखने और diplomatic dialogue जारी रखने की बात कर रहे हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि India-China border dispute हल हो गया है। वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC को लेकर दोनों देशों की interpretation कई क्षेत्रों में अलग है। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि सीमा पर शांति के बिना दोनों देशों के संबंध पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकते। इसलिए अगर मोदी और शी के बीच बातचीत होती है तो उसमें border stability एक महत्वपूर्ण विषय रहेगा। पुतिन की मौजूदगी भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण? रूस SCO का दूसरा बड़ा pillar है। भारत और रूस के बीच दशकों पुराने strategic relations हैं। रक्षा उपकरण, nuclear energy, oil और geopolitical cooperation दोनों देशों के रिश्तों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। Ukraine war के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर बड़े sanctions लगाए, लेकिन भारत ने रूस से energy imports जारी रखे और diplomatic dialogue बनाए रखा। भारत ने युद्ध को लेकर न तो पश्चिमी देशों की पूरी लाइन अपनाई और न ही रूस का खुला समर्थन किया। नई दिल्ली का लगातार रुख रहा है कि संघर्ष का समाधान dialogue और diplomacy से होना चाहिए। इसलिए SCO Summit में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की मौजूदगी global diplomacy के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगी। चीन और रूस के बीच भारत की अलग रणनीति भारत की foreign policy की एक खास बात है। भारत अमेरिका के साथ Quad का सदस्य है। उसी समय रूस के साथ उसके strategic relations बने हुए हैं। और भारत SCO में चीन के साथ भी बैठता है। ऊपर से देखने पर ये रिश्ते contradictory लग सकते हैं। लेकिन यही भारत की strategic autonomy की नीति है। भारत कोशिश करता है कि किसी एक geopolitical camp में पूरी तरह शामिल होने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने national interest के आधार पर संबंध बनाए रखे। SCO इसी नीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। Pakistan Factor को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जब भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एक ही international summit में मौजूद हों तो दोनों नेताओं की संभावित interaction पर स्वाभाविक रूप से नजर रहती है। लेकिन किसी handshake या एक कमरे में मौजूद होने को bilateral breakthrough समझना जल्दबाजी होगी। भारत-पाकिस्तान संबंधों में terrorism, Kashmir और cross-border security जैसे गहरे विवाद मौजूद हैं। भारत का कहना है कि आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। Pakistan लगातार Kashmir issue को international forums पर उठाता रहा है। ऐसे में SCO Summit दोनों देशों को एक ही मंच जरूर देता है, लेकिन bilateral relations में किसी बड़े बदलाव के लिए इससे कहीं अधिक diplomatic groundwork की जरूरत होगी। Connectivity पर भी भारत की अपनी शर्त SCO में China regional connectivity को लगातार बढ़ावा देता रहा है। Beijing की Belt and Road Initiative यानी BRI इसी strategy का बड़ा हिस्सा है। लेकिन भारत ने BRI को endorse नहीं किया है। इसका प्रमुख कारण China-Pakistan Economic Corridor यानी CPEC है, जिसका एक हिस्सा Pakistan-occupied Kashmir से गुजरता है। भारत इसे अपनी sovereignty से जुड़ा मुद्दा मानता है। इसलिए भारत connectivity का समर्थन करता है, लेकिन साथ में sovereignty और territorial integrity के सम्मान की शर्त रखता है। यही nuance SCO discussions में भारत को चीन से अलग position देता है। बिहार और सीमांचल के पाठक के लिए विदेश नीति क्यों महत्वपूर्ण? पहली नजर में Bishkek में हो रही बैठक पूर्णिया, कटिहार या किशनगंज के व्यक्ति से बहुत दूर लग सकती है। लेकिन international relations का असर आखिरकार सामान्य लोगों तक पहुंचता है। China के साथ relations का प्रभाव electronics, mobile phones, solar equipment और manufacturing supply chains पर पड़ सकता है। Russia के साथ relations crude oil और energy prices से जुड़े हैं। Central Asia के साथ connectivity भारत के trade opportunities को प्रभावित कर सकती है। और terrorism तथा regional security का प्रभाव सीधे national security पर पड़ता है। इसलिए विदेश नीति केवल Delhi के diplomatic circles की कहानी नहीं है। उसके आर्थिक परिणाम गांव और शहर के consumer तक पहुंच सकते हैं। SCO की सबसे बड़ी कमजोरी भी यही SCO दुनिया के सबसे बड़े regional organisations में से एक है, लेकिन इसके सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेद भी हैं। भारत-चीन सीमा विवाद। भारत-पाकिस्तान तनाव। Russia-West confrontation। Central Asian countries की अलग security concerns। इन सबके बीच unanimous decisions आसान नहीं होते। इसीलिए SCO की सफलता केवल बड़े group photograph से नहीं मापी जा सकती। असल सवाल यह है कि क्या सदस्य देश terrorism, regional trade और security जैसे मुद्दों पर ground-level cooperation कर पाते हैं। भारत क्या संदेश देना चाहेगा? प्रधानमंत्री मोदी के लिए Bishkek Summit में तीन संदेश महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं। पहला—आतंकवाद पर कोई समझौता नहीं। दूसरा—भारत regional connectivity चाहता है, लेकिन sovereignty की कीमत पर नहीं। और तीसरा—भारत दुनिया के अलग-अलग power centres के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी independent foreign policy जारी रखेगा। यही वजह है कि एक ही मंच पर मोदी का शी जिनपिंग, पुतिन और शहबाज शरीफ जैसे नेताओं के साथ मौजूद होना अपने आप में महत्वपूर्ण diplomatic picture बनता है। लेकिन तस्वीर से ज्यादा महत्वपूर्ण बंद कमरों में होने वाली बातचीत होगी। Handshake नहीं, आगे के फैसले बताएंगे Summit का असर International summits में नेताओं के हाथ मिलाने और group photographs की तस्वीरें सबसे पहले viral होती हैं। लेकिन किसी summit की सफलता उन तस्वीरों से तय नहीं होती। अगर भारत और चीन सीमा पर स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ते हैं, SCO terrorism पर स्पष्ट और प्रभावी position लेता है, Central Asia के साथ भारत की connectivity मजबूत होती है या Russia के साथ strategic cooperation आगे बढ़ता है—तभी Bishkek meeting के वास्तविक परिणाम दिखाई देंगे। फिलहाल दुनिया की नजर इस मंच पर इसलिए है क्योंकि यहां ऐसे चार नेता मौजूद हैं जिनके देशों के बीच सहयोग भी है, प्रतिस्पर्धा भी और कई गंभीर विवाद भी। मोदी, शी, पुतिन और शहबाज एक ही कमरे में बैठ सकते हैं—लेकिन SCO की असली परीक्षा यह है कि क्या इतने अलग हितों वाले देश एक साझा रास्ते पर कुछ कदम साथ चल सकते हैं।

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