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Bihar

बिहार बोर्ड का बड़ा फैसला: अब मार्कशीट पर नहीं दिखेगा ‘FAIL’, उसकी जगह लिखा जाएगा ‘कौशल के लिए पात्र’

10वीं-12वीं के छात्रों को परीक्षा के एक नतीजे से ‘असफल’ घोषित करने की सोच बदलने की कोशिश; लेकिन पास होने के नियम नहीं बदलेंगे, कम अंक पाने वाले…

बिहार बोर्ड का बड़ा फैसला: अब मार्कशीट पर नहीं दिखेगा ‘FAIL’, उसकी जगह लिखा जाएगा ‘कौशल के लिए पात्र’

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10वीं-12वीं के छात्रों को परीक्षा के एक नतीजे से ‘असफल’ घोषित करने की सोच बदलने की कोशिश; लेकिन पास होने के नियम नहीं बदलेंगे, कम अंक पाने वाले विद्यार्थियों को Skill Training से जोड़ने की तैयारी पटना, 29 अगस्त 2026: बिहार में बोर्ड परीक्षा देने वाले लाखों विद्यार्थियों की मार्कशीट में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। बिहार सरकार ने फैसला किया है कि मैट्रिक और इंटरमीडिएट की परीक्षा में निर्धारित अंक हासिल नहीं कर पाने वाले छात्र की मार्कशीट पर अब ‘Fail’ शब्द नहीं लिखा जाएगा। उसकी जगह ‘कौशल के लिए पात्र’ यानी ‘Eligible for Skill Training’ लिखा जाएगा। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने इस बदलाव की घोषणा की है। इसके लिए नियमों में संशोधन किया जाएगा और शिक्षा विभाग बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (BSEB) को आवश्यक निर्देश देगा। पहली नजर में यह केवल एक शब्द बदलने का फैसला लग सकता है। लेकिन सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या किसी बच्चे के भविष्य की पहचान सिर्फ इस आधार पर होनी चाहिए कि वह एक परीक्षा में पास हुआ या फेल? ‘Fail’ हटेगा, लेकिन इसका मतलब ‘Pass’ नहीं सबसे पहले एक भ्रम दूर करना जरूरी है। मार्कशीट से ‘Fail’ शब्द हटाए जाने का मतलब यह नहीं है कि अब बिहार बोर्ड में कोई विद्यार्थी अनुत्तीर्ण ही नहीं होगा। परीक्षा के passing criteria बने रहेंगे। निर्धारित अंक हासिल नहीं करने वाला विद्यार्थी शैक्षणिक रूप से परीक्षा उत्तीर्ण नहीं माना जाएगा। बदलाव उसकी मार्कशीट पर इस्तेमाल होने वाली भाषा में होगा। यानी अगर किसी छात्र ने आवश्यक अंक हासिल नहीं किए तो उसे पास घोषित नहीं किया जाएगा। लेकिन उसकी मार्कशीट पर ऐसा शब्द भी नहीं रहेगा जो लंबे समय तक उसके साथ एक नकारात्मक पहचान की तरह जुड़ा रहे। यहीं इस फैसले का असली अर्थ है। क्यों हटाया जा रहा है ‘Fail’? शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का कहना है कि किसी परीक्षा में अपेक्षित अंक नहीं ला पाना बच्चे की पूरी प्रतिभा का पैमाना नहीं हो सकता। सरकार का मानना है कि ‘Fail’ जैसे शब्द बच्चों के मनोबल पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। इसलिए परिणाम को ऐसे तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है जिसमें विद्यार्थी को यह संदेश मिले कि उसके लिए आगे दूसरा रास्ता मौजूद है। यह फर्क महत्वपूर्ण है। “तुम फेल हो गए” और “तुम इस परीक्षा को पास नहीं कर पाए”—दोनों वाक्यों का अर्थ सुनने वाले बच्चे के लिए एक जैसा नहीं होता। पहला वाक्य व्यक्ति की पहचान पर टिप्पणी जैसा महसूस हो सकता है, जबकि दूसरा केवल एक परीक्षा के परिणाम को बताता है। अब Skill Training का रास्ता सरकार की योजना केवल शब्द बदलने तक सीमित नहीं है। ऐसे विद्यार्थियों को vocational और skill training की तरफ ले जाने की बात भी कही गई है। रिपोर्टों के अनुसार वे Bihar Board of Open Schooling and Examination (BBOSE) के माध्यम से vocational training programmes की ओर बढ़ सकेंगे। यह इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। क्योंकि अगर मार्कशीट पर केवल ‘Fail’ की जगह नया शब्द लिख दिया जाए लेकिन छात्र को आगे कोई वास्तविक रास्ता न मिले, तो बदलाव largely symbolic रह जाएगा। लेकिन यदि विद्यार्थी को उसकी रुचि के अनुसार computer skills, electrical work, electronics, automobile, healthcare support, hospitality, agriculture technology या दूसरे रोजगारपरक क्षेत्रों में training का अवसर मिलता है, तो एक परीक्षा में खराब प्रदर्शन उसके career का अंत नहीं बनेगा। Supplementary परीक्षा वालों को एक महीने की विशेष पढ़ाई सरकार उन विद्यार्थियों के लिए भी अलग व्यवस्था करने जा रही है जो मैट्रिक की supplementary examination देंगे। ऐसे छात्रों के लिए एक महीने तक विशेष कक्षाएं चलाने की योजना है ताकि वे दोबारा परीक्षा की बेहतर तैयारी कर सकें। यह पहल केवल भाषा बदलने की तुलना में कहीं ज्यादा व्यावहारिक है। क्योंकि किसी विद्यार्थी को यह बताना कि वह ‘असफल’ नहीं है जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है उसे अगली कोशिश में सफल होने के लिए academic support देना। पूर्णिया-कटिहार-अररिया-किशनगंज के छात्रों के लिए क्यों अहम? सीमांचल में इस फैसले को केवल पटना की education policy के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज के ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों विद्यार्थी बिहार बोर्ड से 10वीं और 12वीं की परीक्षा देते हैं। कई परिवारों में बच्चा पहली पीढ़ी का विद्यार्थी होता है। ऐसे परिवार में बोर्ड परीक्षा का परिणाम केवल बच्चे का result नहीं रहता—उससे परिवार की उम्मीदें, आगे की पढ़ाई और कई बार आर्थिक फैसले भी जुड़े होते हैं। खराब result आने के बाद कुछ छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं। कुछ दोबारा परीक्षा देने से हिचकते हैं और कुछ को लगता है कि उनके लिए आगे कोई विकल्प नहीं बचा। यहीं ‘कौशल के लिए पात्र’ की अवधारणा उपयोगी हो सकती है—बशर्ते इसके बाद वास्तव में skill education तक पहुंच बनाई जाए। सबसे बड़ा सवाल—Skill Centre कहां होगा? सरकार के फैसले की वास्तविक परीक्षा गांवों में होगी। मान लीजिए अररिया के किसी गांव का विद्यार्थी 10वीं पास नहीं कर पाया और उसकी मार्कशीट पर लिखा गया—‘कौशल के लिए पात्र’। अब अगला सवाल होगा: उसे training कहां मिलेगी? जिला मुख्यालय में? प्रखंड में? ITI में? ऑनलाइन? Training मुफ्त होगी या फीस लगेगी? उस skill certificate को नौकरी देने वाली कंपनियां कितना महत्व देंगी? यही वे सवाल हैं जिनके जवाब इस policy को सफल या केवल आकर्षक घोषणा बनाएंगे। हर बच्चा Mathematics में अच्छा हो, जरूरी नहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय तक सफलता का एक सीधा formula माना जाता रहा है—अच्छे marks, अच्छी degree और फिर नौकरी। लेकिन वास्तविक दुनिया इतनी सीधी नहीं है। कोई बच्चा Mathematics में कमजोर हो सकता है लेकिन मशीनों को समझने में बहुत अच्छा हो सकता है। किसी को किताब पढ़कर समझने में मुश्किल हो सकती है लेकिन computer hardware खोलकर कुछ ही समय में समझ सकता है। कोई शानदार photographer, video editor, electrician, designer, mechanic या entrepreneur बन सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि academic education महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि अर्थ यह है कि academic performance और talent हमेशा एक ही चीज नहीं होते। बिहार सरकार के इस फैसले का मूल विचार भी इसी दिशा में दिखाई देता है। लेकिन ‘Fail’ शब्द हटाने से समस्या खत्म नहीं होगी इस फैसले पर आलोचनात्मक सवाल पूछना भी जरूरी है। अगर विद्यार्थी पढ़ नहीं पा रहा है क्योंकि स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, विषय समझ नहीं आ रहा, परिवार की आर्थिक स्थिति खराब है या उसे पढ़ाई के साथ काम करना पड़ता है—तो केवल उसकी मार्कशीट की भाषा बदलने से मूल समस्या हल नहीं होगी। सरकार को यह भी पता लगाना होगा कि बच्चा परीक्षा में पीछे क्यों रह गया। यानी नीति के तीन हिस्से होने चाहिए: पहचान — सहायता — दूसरा अवसर। पहले कमजोर विद्यार्थी की पहचान हो। फिर उसे academic support मिले। और इसके बावजूद traditional academics में आगे नहीं बढ़ पाता तो उसके सामने सम्मानजनक skill-based career pathway मौजूद हो। माता-पिता की सोच बदलना भी जरूरी इस policy की एक और चुनौती घर के भीतर है। आज भी बहुत से परिवारों में 10वीं या 12वीं के खराब परिणाम को बच्चे की जिंदगी का निर्णायक मोड़ मान लिया जाता है। रिश्तेदारों और पड़ोसियों की तुलना अलग दबाव बनाती है—“उसके बेटे के 85% आए, तुम्हारे कितने आए?” ऐसी तुलना में बच्चा धीरे-धीरे अपने marks को अपनी क्षमता मानने लगता है। सरकार मार्कशीट से ‘Fail’ हटा सकती है, लेकिन समाज की भाषा बदलना ज्यादा कठिन है। इसलिए schools को parents counselling पर भी काम करना चाहिए। अच्छा विचार, लेकिन असली परीक्षा implementation की बिहार सरकार का फैसला शिक्षा व्यवस्था में एक दिलचस्प बदलाव की शुरुआत हो सकता है। ‘Fail’ हटाना अपने आप में शिक्षा सुधार नहीं है। लेकिन अगर इसके साथ supplementary classes, counselling, vocational education, स्थानीय skill centres और रोजगार से जुड़ी training आती है, तो यह एक बच्चे को दूसरा रास्ता देने वाली policy बन सकती है। विशेष कक्षाओं की योजना इसी दिशा का शुरुआती संकेत देती है। अंततः सवाल मार्कशीट पर लिखे एक शब्द का नहीं है। सवाल यह है कि जब 16 या 17 साल का बच्चा परीक्षा में पीछे रह जाए, तब शिक्षा व्यवस्था उससे क्या कहती है— “तुम फेल हो।” या, “यह रास्ता नहीं चला, तुम्हारे लिए दूसरा रास्ता अभी भी खुला है।” बिहार ने मार्कशीट की भाषा में दूसरा रास्ता चुना है। अब देखना होगा कि ‘कौशल के लिए पात्र’ लिखने के बाद सरकार उस कौशल तक पहुंचने का वास्तविक रास्ता भी बनाती है या नहीं।

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