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Bihar

बिहार में अब स्कूल-कॉलेज के बाहर बाइक पर दिखेंगी ‘पुलिस दीदी’: 4,700 वाहन रवाना, छात्राओं की सुरक्षा के लिए तय होगी दो घंटे की विशेष गश्त

छेड़खानी और असुरक्षित रास्तों पर नजर रखने के लिए ‘अभया ब्रिगेड’ को मिली नई ताकत; हर थाने में महिला सब-इंस्पेक्टर के नेतृत्व में टीम, स्कूल खुलने और छुट्टी…

बिहार में अब स्कूल-कॉलेज के बाहर बाइक पर दिखेंगी ‘पुलिस दीदी’: 4,700 वाहन रवाना, छात्राओं की सुरक्षा के लिए तय होगी दो घंटे की विशेष गश्त

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छेड़खानी और असुरक्षित रास्तों पर नजर रखने के लिए ‘अभया ब्रिगेड’ को मिली नई ताकत; हर थाने में महिला सब-इंस्पेक्टर के नेतृत्व में टीम, स्कूल खुलने और छुट्टी के समय रहेगा खास फोकस पटना, 27 अगस्त 2026: बिहार में स्कूल या कॉलेज जाने वाली छात्राओं को अब रास्ते में एक नई पुलिस व्यवस्था दिखाई देगी। राज्य सरकार ने ‘पुलिस दीदी’ यानी अभया ब्रिगेड के लिए 4,700 स्कूटर और मोटरसाइकिल रवाना किए हैं। इन वाहनों के जरिए पुलिस की टीमें स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय परिसर और उन रास्तों पर नियमित गश्त करेंगी जहां छात्राओं तथा महिलाओं की आवाजाही अधिक रहती है। योजना की खास बात केवल महिला पुलिसकर्मियों को वाहन देना नहीं है। बिहार पुलिस ने educational institutions के आसपास दो घंटे की विशेष beat patrolling तय करने की बात कही है। स्कूल-कॉलेज खुलने और छुट्टी होने के समय के अनुसार गश्त का समय बदला जाएगा। अगर यह व्यवस्था जमीन पर उसी तरह लागू होती है जैसी इसकी योजना बनाई गई है, तो पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज जैसे जिलों में भी छात्राओं के लिए इसका सीधा असर दिखाई दे सकता है। 2,700 स्कूटर महिला पुलिसकर्मियों को पटना के ज्ञान भवन में बुधवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने वाहनों को हरी झंडी दिखाई। गृह विभाग के अनुसार कुल 4,700 दोपहिया वाहनों में 2,700 स्कूटर महिला पुलिसकर्मियों और 2,000 मोटरसाइकिल पुरुष कांस्टेबलों के लिए आवंटित किए गए हैं। इन्हें अलग-अलग जिलों में भेजा जा रहा है। इसका उद्देश्य पुलिस टीमों की mobility बढ़ाना है। कई बार किसी स्कूल या कॉलेज के आसपास समस्या स्थायी पुलिस चौकी की जरूरत जितनी बड़ी नहीं होती, लेकिन वहां नियमित निगरानी की आवश्यकता होती है। दोपहिया वाहन ऐसी जगहों पर patrol करने के लिए उपयोगी हो सकते हैं। सिर्फ स्कूल के गेट पर खड़ी नहीं रहेंगी ‘पुलिस दीदी’ इस योजना को केवल स्कूल के सामने महिला पुलिसकर्मी खड़ी करने की व्यवस्था समझना अधूरा होगा। बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार के मुताबिक patrol का मुख्य focus educational institutions और उनके आसपास के क्षेत्रों पर रहेगा। स्कूल-कॉलेज खुलने और बंद होने के समय विशेष beat चलेगी और institutions बंद रहने के दौरान टीमें आसपास के क्षेत्रों में patrol करेंगी। इसका मतलब है कि कॉलेज के मुख्य गेट के साथ वह रास्ता भी महत्वपूर्ण होगा जिससे छात्राएं आती-जाती हैं। कई मामलों में परेशानी institution के अंदर नहीं बल्कि बाहर के बाजार, सुनसान मोड़, बस स्टॉप या घर लौटने वाले रास्ते पर होती है। हर थाने में बनाई गई है अभया ब्रिगेड ‘पुलिस दीदी’ अचानक शुरू किया गया नाम नहीं है। बिहार पुलिस मुख्यालय ने दिसंबर 2025 में अभया ब्रिगेड की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य स्कूल और कॉलेजों के आसपास छेड़खानी तथा महिलाओं को परेशान करने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना था। पुलिस के framework के मुताबिक प्रत्येक थाना क्षेत्र में अभया ब्रिगेड की unit का नेतृत्व महिला Sub-Inspector करती है। उसके साथ तीन कांस्टेबल होते हैं—एक महिला और दो पुरुष। इस तरह यह केवल एक महिला पुलिसकर्मी की patrol नहीं बल्कि छोटी dedicated policing unit के रूप में काम करने वाली व्यवस्था है। पहले पहचानेंगे ‘Hotspots’ योजना का शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा hotspot identification है। अभया ब्रिगेड को अपने थाना क्षेत्र में ऐसी जगहों की पहचान करनी है जहां महिलाओं और छात्राओं को harassment का खतरा अधिक हो सकता है। इनमें educational institutions के आसपास के इलाके, सुनसान रास्ते, बाजार, parks और transit points शामिल हो सकते हैं। यह तरीका केवल घटना होने के बाद FIR दर्ज करने वाली policing से थोड़ा अलग है। अगर किसी कॉलेज के बाहर लगातार कुछ लोग छात्राओं को परेशान करते हैं तो पुलिस को complaint आने का इंतजार करने के बजाय उस location को hotspot बनाकर वहां patrol बढ़ाने का अवसर मिलेगा। पूर्णिया-कटिहार जैसे शहरों में क्यों महत्वपूर्ण? सीमांचल के शहरों में बड़ी संख्या में छात्राएं आसपास के गांवों और कस्बों से पढ़ने आती हैं। पूर्णिया में colleges और coaching centres की संख्या बढ़ी है। कटिहार बड़ा educational और transportation hub है। अररिया और किशनगंज में भी district headquarters तक रोज बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं पहुंचते हैं। इनमें से कई विद्यार्थियों को बस, ऑटो, ई-रिक्शा या पैदल कुछ दूरी तय करनी पड़ती है। इसलिए सुरक्षा केवल campus gate तक सीमित नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए किसी छात्रा को college के बाहर सुरक्षा मिल जाए, लेकिन घर जाने वाले bus stand तक का रास्ता असुरक्षित हो, तो पूरी व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। इसीलिए Police Didi patrol में route mapping बेहद महत्वपूर्ण होगा। Coaching Centres को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता आज formal colleges के अलावा coaching ecosystem भी student movement का बड़ा हिस्सा है। कई coaching classes सुबह बहुत जल्दी शुरू होती हैं और कुछ batches शाम तक चलते हैं। ऐसे समय public transport कम हो सकता है और रास्तों पर भीड़ भी सामान्य समय से अलग रहती है। अगर अभया ब्रिगेड स्थानीय स्तर पर coaching hubs को भी hotspot mapping में शामिल करती है तो योजना का प्रभाव ज्यादा व्यापक हो सकता है। हालांकि उपलब्ध आधिकारिक विवरण मुख्य रूप से schools, colleges, universities और educational institutions की बात करता है। 40 हजार महिला पुलिसकर्मी बड़ी ताकत बिहार पुलिस के मुताबिक राज्य के police force में लगभग 40,000 महिलाएं भर्ती होकर training प्राप्त कर चुकी हैं और विभिन्न जिलों में तैनात हैं। यह संख्या Police Didi initiative के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। महिला सुरक्षा के मामलों में कई पीड़िताएं पुरुष पुलिसकर्मी की तुलना में महिला अधिकारी के सामने अपनी समस्या बताने में ज्यादा सहज महसूस कर सकती हैं। लेकिन इसके लिए Police Didi की पहचान भी स्पष्ट होनी चाहिए। छात्राओं को पता होना चाहिए कि उनके इलाके की Police Didi कौन है और emergency में उससे संपर्क कैसे करना है। 112 से भी जोड़ी जाएगी जागरूकता अभया ब्रिगेड की जिम्मेदारी केवल patrol और कार्रवाई तक सीमित नहीं रखी गई है। टीमों को educational institutions से संपर्क बनाए रखने और Dial-112 emergency service के बारे में awareness फैलाने की जिम्मेदारी भी दी गई है। यह जरूरी है क्योंकि emergency system तभी उपयोगी होता है जब लोगों को पता हो कि उसका इस्तेमाल कब और कैसे करना है। सरकार का कहना है कि बिहार में 112 का response time 10 मिनट से नीचे आया है और इसे आगे 5 से 7 मिनट तक लाने का लक्ष्य है। सिर्फ स्कूटी बांटने से तय नहीं होगी सफलता 4,700 vehicles का rollout headline जरूर बनता है, लेकिन योजना की वास्तविक परीक्षा कुछ महीनों बाद होगी। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि इन वाहनों से रोज कितनी patrol होती है। कितने hotspots की पहचान हुई? कितनी complaints Police Didi तक पहुंचीं? कितने मामलों में preventive intervention हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या छात्राओं को अपने रास्ते पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस होने लगे? अगर vehicles थाना परिसर में खड़े रह गए तो योजना का असर सीमित रहेगा। लेकिन अगर उनकी beat GPS या digital log के जरिए monitor की जाए और हर थाना अपने vulnerable locations का record रखे तो initiative ज्यादा accountable हो सकता है। छात्राओं से सीधे Feedback लेना होगा इस योजना की सफलता मापने का सबसे अच्छा तरीका केवल police statistics नहीं हो सकता। स्कूल और कॉलेज की छात्राओं से confidential feedback भी लिया जाना चाहिए। उनसे पूछा जा सकता है कि institution के आसपास कौन-सी जगह असुरक्षित लगती है, किस समय परेशानी ज्यादा होती है और patrol के बाद स्थिति में क्या बदलाव आया। कई बार पुलिस जिस जगह को safe मानती है, विद्यार्थी उसी रास्ते को unsafe महसूस करते हैं। इस gap को छात्राओं के feedback से ही समझा जा सकता है। परिवारों पर भी पड़ सकता है असर महिला सुरक्षा का education पर अप्रत्यक्ष लेकिन गंभीर प्रभाव पड़ता है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवार बेटियों की पढ़ाई का फैसला केवल college की quality देखकर नहीं करते। वे यह भी देखते हैं कि कॉलेज कितनी दूर है, रास्ता कैसा है और शाम को बेटी सुरक्षित घर लौट पाएगी या नहीं। अगर educational routes ज्यादा सुरक्षित होते हैं तो इसका असर attendance और higher education में girls' participation तक जा सकता है। इसलिए Police Didi को केवल law-and-order programme मानना शायद इसकी संभावनाओं को कम करके देखना होगा। असली परीक्षा अब जिलों में पटना से 4,700 स्कूटर और मोटरसाइकिल रवाना करना योजना की शुरुआत है। असली काम तब शुरू होगा जब ये वाहन जिलों और थाना क्षेत्रों तक पहुंचेंगे। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज को कितने वाहन मिलते हैं, किन स्कूल-कॉलेजों को priority दी जाती है और Police Didi की patrol वास्तव में कितनी नियमित होती है। बिहार ने एक practical idea पर काम शुरू किया है—महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुलिस को वहीं पहुंचाना जहां छात्राओं की रोज आवाजाही होती है। अब इस योजना की सफलता किसी समारोह या स्कूटी की संख्या से नहीं मापी जाएगी। इसकी असली सफलता उस दिन होगी जब किसी छात्रा को कॉलेज जाने का रास्ता बदलने की जरूरत सिर्फ इसलिए न पड़े कि वहां कुछ लोग उसे रोज परेशान करते हैं।

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