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BA-BSc-BCom की डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी: NITI Aayog ने उठाया बड़ा सवाल, क्या बदलने वाला है भारत का Graduation System?

रिपोर्ट में ‘Generic Degrees’ की रोजगार से कमजोर कड़ी पर चिंता; सिर्फ डिग्री देने के बजाय skills, internship और industry exposure से जोड़ने की जरूरत नई…

BA-BSc-BCom की डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी: NITI Aayog ने उठाया बड़ा सवाल, क्या बदलने वाला है भारत का Graduation System?

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रिपोर्ट में ‘Generic Degrees’ की रोजगार से कमजोर कड़ी पर चिंता; सिर्फ डिग्री देने के बजाय skills, internship और industry exposure से जोड़ने की जरूरत नई दिल्ली, 26 अगस्त 2026: भारत में हर साल लाखों युवा BA, BSc और BCom जैसी graduation degrees लेकर कॉलेजों से निकलते हैं। परिवार को उम्मीद होती है कि तीन-चार साल की पढ़ाई के बाद बेटा या बेटी नौकरी की दौड़ में मजबूत स्थिति में होगा। लेकिन अब देश के प्रमुख policy institution NITI Aayog ने इन सामान्य graduation degrees और रोजगार के बीच कमजोर होते संबंध पर गंभीर सवाल उठाया है। यह बहस केवल curriculum बदलने की नहीं है। सवाल इससे बड़ा है—क्या हमारी higher education युवाओं को degree तो दे रही है, लेकिन नौकरी के लिए जरूरी क्षमता नहीं? अगर इसका जवाब हां है तो इसका असर बिहार जैसे राज्यों पर और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां बड़ी संख्या में युवा सामान्य graduation करने के बाद सरकारी नौकरी की तैयारी या सीमित private employment opportunities पर निर्भर रहते हैं। BA, BSc और BCom को लेकर क्या चिंता है? NITI Aayog से जुड़े higher-education reform discussion में BA, BSc और BCom जैसी ‘generic degrees’ के job linkages कमजोर होने की बात सामने आई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ये degrees बेकार हैं। BA से humanities और social sciences की समझ विकसित होती है। BSc scientific foundation देता है और BCom commerce, accounting तथा economics जैसे क्षेत्रों का आधार तैयार करता है। समस्या तब पैदा होती है जब degree और actual employment market के बीच कोई स्पष्ट रास्ता नहीं बनता। विद्यार्थी तीन वर्ष कॉलेज में बिताता है, examination पास करता है और degree हासिल करता है—लेकिन नौकरी के interview में employer उससे communication, computer proficiency, data handling, practical accounting, digital tools या किसी specific professional skill की मांग करता है। यहीं education और employment के बीच gap दिखाई देता है। कॉलेज से निकलते ही शुरू होती है दूसरी पढ़ाई भारत के graduation system की एक दिलचस्प स्थिति है। कई विद्यार्थी degree पूरी करने के बाद सीधे नौकरी में जाने के बजाय फिर coaching institutes का रुख करते हैं। कोई SSC की तैयारी करता है, कोई banking, कोई railway, कोई BPSC-UPSC और कोई शिक्षक भर्ती के लिए अलग तैयारी शुरू करता है। यानी graduation के तीन साल पूरे करने के बाद भी रोजगार हासिल करने के लिए एक दूसरी parallel education शुरू हो जाती है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर college education को रोजगार से बेहतर तरीके से जोड़ा जाए तो क्या युवाओं को इस अतिरिक्त transition में कम समय लग सकता है? बिहार के लिए सवाल और बड़ा बिहार में यह मुद्दा खास महत्व रखता है। पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज और दूसरे जिलों के हजारों विद्यार्थी स्थानीय colleges से BA, BSc और BCom करते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे परिवारों से आती है जिनके लिए higher education पर खर्च करना महत्वपूर्ण आर्थिक फैसला होता है। Graduation के बाद अगर रोजगार का स्पष्ट रास्ता नहीं मिलता तो छात्र के सामने सीमित विकल्प बचते हैं—सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी तैयारी, दूसरे शहर में migration या फिर ऐसा काम जिसका उसकी degree से कोई सीधा संबंध नहीं होता। यही कारण है कि higher-education reform को केवल दिल्ली, मुंबई या बड़े universities के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। छोटे शहरों और ग्रामीण भारत की जरूरतें अलग हैं। Degree के साथ Skill क्यों जरूरी? मान लीजिए कोई छात्र BCom कर रहा है। अगर उसे syllabus के साथ GST filing, accounting software, Excel, digital payments, basic taxation और छोटे business की bookkeeping का practical training मिले तो graduation के बाद उसके पास नौकरी के कई अतिरिक्त रास्ते खुल सकते हैं। इसी तरह BA के विद्यार्थी को communication, content writing, translation, digital marketing, public administration या research tools का practical exposure दिया जा सकता है। BSc के विद्यार्थियों को laboratory skills, data analysis, environmental testing, healthcare support या संबंधित technical skills से जोड़ा जा सकता है। इसका मतलब traditional subjects को खत्म करना नहीं है। मकसद यह होना चाहिए कि academic knowledge के साथ employable capability भी विकसित हो। Internship सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित क्यों? देश के बड़े professional colleges में internship सामान्य बात है, लेकिन सामान्य degree colleges में इसका implementation बहुत uneven है। इसे बदलने की जरूरत है। पूर्णिया का BCom student किसी local CA firm, bank-support operation या business enterprise में internship कर सकता है। Journalism या humanities का विद्यार्थी local media organisation, NGO या district-level institution के साथ practical experience हासिल कर सकता है। Science students laboratories, hospitals, agriculture centres और environmental projects से जुड़ सकते हैं। अगर graduation के दौरान ही विद्यार्थी वास्तविक workplace देख लेता है तो degree पूरी होने के बाद नौकरी की दुनिया उसके लिए पूरी तरह नई नहीं रहती। Local Industry से College को जोड़ना होगा हर जिले में IIT या बड़ी multinational company होना जरूरी नहीं है। Skill development स्थानीय economy के आधार पर भी किया जा सकता है। सीमांचल में agriculture, food processing, maize, makhana, tea, logistics, healthcare, education, media और small businesses से रोजगार पैदा होता है। अगर colleges इन sectors से partnerships बनाएं तो विद्यार्थियों को अपने ही क्षेत्र में practical opportunities मिल सकती हैं। उदाहरण के लिए किशनगंज में tea industry से जुड़े courses, पूर्णिया में agriculture और food-processing skills तथा कटिहार में logistics और transportation ecosystem से संबंधित training स्थानीय जरूरतों के अधिक करीब हो सकती है। इससे education और district economy के बीच सीधा connection बन सकता है। सिर्फ सरकारी नौकरी रोजगार नीति नहीं हो सकती बिहार में सरकारी नौकरी का आकर्षण बहुत मजबूत है और इसके पीछे कारण भी हैं—job security, नियमित salary और social status। लेकिन हर graduate को सरकारी नौकरी देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। इसलिए higher education का ऐसा model जरूरी है जिसमें सरकारी परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र भी सक्षम हो और private sector या entrepreneurship चुनने वाले विद्यार्थी के पास भी practical skills हों। आज समस्या तब पैदा होती है जब graduate के पास degree तो होती है, लेकिन उसके सामने रोजगार के विकल्प बहुत सीमित दिखाई देते हैं। फिर लाखों उम्मीदवार कुछ हजार सरकारी vacancies के पीछे एक साथ खड़े हो जाते हैं। AI आने के बाद चुनौती और बढ़ेगी Artificial Intelligence इस debate को और महत्वपूर्ण बना रही है। Basic documentation, data entry, routine accounting, translation और कई repetitive office tasks तेजी से automated हो रहे हैं। ऐसे में आने वाले वर्षों में केवल theoretical knowledge के आधार पर employment हासिल करना और कठिन हो सकता है। Students को AI tools से डराने के बजाय उनका सही इस्तेमाल सिखाना जरूरी होगा। Research कैसे करें, data कैसे समझें, AI-generated information को verify कैसे करें और technology के साथ productivity कैसे बढ़ाएं—ये भविष्य की workplace skills का हिस्सा बन सकती हैं। English ही Employability नहीं है Skill development की चर्चा में अक्सर एक गलती होती है—employability को केवल अच्छी English बोलने से जोड़ दिया जाता है। Communication महत्वपूर्ण है, लेकिन skill उससे कहीं व्यापक है। एक हिंदी माध्यम का विद्यार्थी भी शानदार accountant, designer, programmer, technician, researcher, journalist या entrepreneur बन सकता है। जरूरत है उसे relevant tools और practical exposure देने की। इसलिए regional-language students को कमजोर मानने के बजाय technical terminology और professional skills उनकी अपनी भाषा के सहारे भी सिखाई जानी चाहिए। College की सफलता का पैमाना भी बदलना होगा आज किसी college की सफलता अक्सर इस आधार पर देखी जाती है कि कितने students enrolled हैं और कितने examination पास हुए। लेकिन एक तीसरा सवाल भी पूछा जाना चाहिए— Graduation के छह या बारह महीने बाद उसके विद्यार्थियों की स्थिति क्या है? कितनों को नौकरी मिली? कितनों ने higher education चुनी? कितनों ने business शुरू किया? कितने competitive examinations में सफल हुए? और कितने ऐसे हैं जिनके पास degree तो है लेकिन आगे का रास्ता स्पष्ट नहीं? अगर colleges इस data को track करें तो curriculum की वास्तविक effectiveness समझना आसान होगा। BA-BSc-BCom खत्म करने की नहीं, मजबूत करने की जरूरत NITI Aayog से सामने आई चिंता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सामान्य graduation degrees को समाप्त कर दिया जाए। इनका academic और सामाजिक महत्व बहुत बड़ा है। जरूरत इन्हें 21वीं सदी के रोजगार बाजार के साथ दोबारा जोड़ने की है। Degree में knowledge हो, लेकिन उसके साथ internship हो। Theory हो, लेकिन practical project भी हो। Examination हो, लेकिन communication और digital skills का assessment भी हो। और सबसे महत्वपूर्ण—विद्यार्थी को graduation के पहले दिन से पता होना चाहिए कि उसकी पढ़ाई उसे किन career paths तक ले जा सकती है। NITI Aayog द्वारा generic degrees के कमजोर job linkages पर उठाया गया सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे भारत के करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ता है। भारत को ज्यादा graduates बनाने से आगे बढ़कर ज्यादा सक्षम graduates बनाने होंगे। डिग्री की असली कीमत उस कागज में नहीं है जो convocation में मिलता है—उसकी कीमत इस बात में है कि तीन-चार साल की पढ़ाई के बाद युवा अपने पैरों पर खड़ा होने के कितने रास्ते देख पाता है।

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