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गया की प्रियंका मधुबनी कला से सजा रहीं छठ पूजा के सूप, पेश कर रही भक्ति और रचनात्मकता का अनोखा संगम

Published: 25/10/2025, 11:52:51 am20 viewsSeemanchal Live

गया (बिहार): छठ पूजा के पावन अवसर पर गया जिले में एक युवती अपनी कला से आस्था और परंपरा का अनोखा संगम पेश कर रही हैं। कस्तूरबा गांधी बालिका उच्च विद्यालय, टनकुप्पा की आश्रमपाल कुमारी प्रियंका मधुबनी कला के माध्यम से छठ पूजा में प्रयुक्त सूपों को सजा रही हैं । वह इन सजे हुए सूपों को व्रतियों को भक्ति-

गया की प्रियंका मधुबनी कला से सजा रहीं छठ पूजा के सूप, पेश कर रही भक्ति और रचनात्मकता का अनोखा संगम
गया (बिहार): छठ पूजा के पावन अवसर पर गया जिले में एक युवती अपनी कला से आस्था और परंपरा का अनोखा संगम पेश कर रही हैं। कस्तूरबा गांधी बालिका उच्च विद्यालय, टनकुप्पा की आश्रमपाल कुमारी प्रियंका मधुबनी कला के माध्यम से छठ पूजा में प्रयुक्त सूपों को सजा रही हैं । वह इन सजे हुए सूपों को व्रतियों को भक्ति-भाव से भेंट कर रही हैं , जिससे छठ पूजा की तैयारियों में नई रौनक आ गई है। फल्गु तट पर भक्ति और कला का मिलन गया की पवित्र फल्गु नदी के तट पर प्रियंका भक्ति में लीन होकर सूपों पर मधुबनी कला उकेरती हैं। कभी फल्गु की रेत पर, तो कभी बंसी नदी के किनारे बैठकर, वह सूर्य देव और छठ माता के चित्र बनाती हैं। प्रियंका कहती हैं — “पेंटिंग मेरा शौक था, लेकिन अब यह भक्ति बन चुकी है। जब मैं छठ माता और सूर्य देव के चित्र बनाती हूं, तो ऐसा लगता है मानो मैं खुद अर्घ्य अर्पित कर रही हूं।” उनकी यह कला केवल सजावट नहीं, बल्कि आस्था, मातृत्व और लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति है। मधुबनी कला से सजे सूपों पर छठ की झलक प्रियंका के हाथों सजे हर सूप पर छठ पर्व की धार्मिक झलकियां जीवंत हो उठती हैं। उनके चित्रों में— सूर्य देव और छठ माता , अर्घ्य अर्पित करती महिलाएं , गन्ना, केले के पत्ते, दीपक, फल और मिट्टी के हाथी की आकृतियाँ देखी जा सकती हैं। मधुबनी कला की पारंपरिक शैली में बनी ये पेंटिंग्स प्राकृतिक रंगों से तैयार की जाती हैं। इनमें ज्यामितीय पैटर्न , सांस्कृतिक प्रतीक और लोक जीवन की कहानियाँ झलकती हैं, जो मिथिला क्षेत्र की पहचान हैं। तीन घाटों पर 50 सजे सूपों का संकल्प प्रियंका ने इस बार छठ पूजा में तीन घाटों पर 50 सूप सजाने का संकल्प लिया है। उन्होंने शुरुआत अपने स्कूल के पास बंसी नदी घाट से की, फिर फल्गु नदी घाट तक पहुंचीं। अब तक उन्होंने 50 से अधिक सूप तैयार कर व्रतियों को दान कर दिए हैं। वह कहती हैं — “ये सूप केवल पूजा की वस्तु नहीं हैं, बल्कि भक्ति को सुंदरता से सजाने का माध्यम हैं।” उनकी कला देखने के लिए स्थानीय लोग और छठ व्रती बड़ी संख्या में घाटों पर पहुंच रहे हैं। भक्ति में लीन रचनात्मकता का स्वरूप प्रियंका का यह कार्य एक अपूर्ण मनोकामना के पूर्ण होने का परिणाम है। हालांकि वह उस मनोकामना का विवरण साझा नहीं करतीं, पर कहती हैं — “जब मैं चित्र बनाती हूं, तो खुद को भक्ति में डूबा हुआ पाती हूं। यह मेरे जीवन का सबसे पवित्र क्षण होता है।” छठ की तैयारियों के बीच वह दिनभर घाट पर बैठकर सूप सजाती हैं। लोग उन्हें देखकर कहते हैं — “यह सिर्फ कला नहीं, यह आस्था की आराधना है।” कला से लोक परंपरा को नया जीवन प्रियंका का प्रयास मधुबनी कला को आधुनिक संदर्भों में जीवित रखने का उदाहरण बन गया है। उन्होंने 2023 में मधुबनी कला की औपचारिक शिक्षा ली थी। सिर्फ दो वर्षों में उन्होंने इस कला को भक्ति और लोक परंपरा से जोड़ दिया। वह कहती हैं — “कला तभी सार्थक होती है, जब वह समाज और संस्कृति से जुड़ जाए।” उनकी इस पहल से युवा पीढ़ी में लोक कला के प्रति नया आकर्षण देखा जा रहा है। शैक्षणिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि प्रियंका मूल रूप से पटना जिले के मसौढ़ी की निवासी हैं, लेकिन वर्तमान में उनका परिवार झारखंड के बोकारो स्टील सिटी में बसता है। उन्होंने हिंदी विषय से एमए और बीएड किया है। पिता सोनू महतो का निधन पिछले वर्ष हुआ, जिसके बाद उन्होंने जीवन को भक्ति और कला के मार्ग पर समर्पित कर दिया। तीन बहनों में सबसे छोटी प्रियंका अपने भाई के साथ बोकारो में रहती हैं। वह छात्राओं को नि:शुल्क मधुबनी पेंटिंग सिखाती हैं , ताकि अन्य युवतियाँ भी आत्मनिर्भर बन सकें। छात्राओं में कला के प्रति नई जागरूकता कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में प्रियंका के आने के बाद छात्राओं में लोक कला और पेंटिंग के प्रति नई जागृति आई है। विद्यालय की वार्डन मृदुला कुमारी कहती हैं — “प्रियंका का कार्य केवल कला नहीं, बल्कि आस्था और मातृशक्ति का प्रतीक है। इस वर्ष मैं खुद छठ व्रत कर रही हूं और उन्होंने मुझे भी एक सजा हुआ सूप भेंट किया।” प्रियंका ने विद्यालय की हर महिला कर्मचारी को भी सजे हुए सूप भेंट किए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कला का विस्तार प्रियंका की मधुबनी कला अब राज्य सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच चुकी है। उन्होंने दिल्ली, बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश में कई कार्यशालाएँ आयोजित की हैं। पद्मश्री कलाकारों से प्रशिक्षण लेकर अब वह खुद प्रशिक्षक बन चुकी हैं। अब तक वह 500 से अधिक छात्राओं को प्रशिक्षित कर चुकी हैं और इस कला को महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम बना चुकी हैं। लोगों का आकर्षण और सम्मान फल्गु और बंसी नदी घाट पर लोग प्रियंका के सजे हुए सूपों को देखने उमड़ रहे हैं। लोग इन्हें “ छठ का सबसे सुंदर उपहार ” बता रहे हैं। उनकी कला को स्थानीय प्रशासन, स्कूल प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। FAQs: प्रियंका की मधुबनी कला और छठ पूजा से जुड़े प्रश्न Q1. प्रियंका कुमारी कौन हैं? 👉 गया की रहने वाली एक युवती जो मधुबनी कला से छठ पूजा के सूप सजा रही हैं। Q2. उन्होंने यह कार्य कब शुरू किया? 👉 2023 में मधुबनी कला सीखने के बाद से। Q3. वह सूपों पर क्या चित्र बनाती हैं? 👉 सूर्य देव, छठ माता, व्रती महिलाएं, दीपक, फल और पूजा के दृश्य। Q4. क्या वह ये सूप बेचती हैं या दान करती हैं? 👉 वह इन्हें श्रद्धापूर्वक व्रतियों को भेंट (दान) करती हैं। Q5. कितने सूप उन्होंने तैयार किए हैं? 👉 इस बार उन्होंने 50 से अधिक सूप सजाए और तीन घाटों पर वितरित किए हैं। Q6. वह और कहाँ यह कला सिखाती हैं? 👉 दिल्ली, बंगाल, झारखंड और अन्य राज्यों में वह कार्यशालाएँ आयोजित करती हैं। 🌞 निष्कर्ष प्रियंका की यह पहल छठ पूजा की आस्था और मधुबनी कला की परंपरा का अद्भुत संगम है। उनकी कला भक्ति, संस्कृति और रचनात्मकता का ऐसा रूप है जो समाज को जोड़ती है, प्रेरणा देती है और बिहार की लोक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बनती है। 📎 संदर्भ: बिहार पर्यटन विभाग – लोक कला और छठ पूजा परंपरा

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