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कार्तिक माह के त्रियोदशी को मनाया जाता है धनतेरस

कार्तिक माह के त्रियोदशी को मनाया जाता है धनतेरस जिले के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में धनतेरस को लेकर दुकानदारों ने तैयारी को अंतिम रूप दिया। लोगों ने भी धनतेरस की खरीददारी की रूपरेखा तैयार कर लिये है। कार्तिक मास की कृष्ण त्रियोदशी को धनतेरस मनाया जाता है। धनतेरस में नए बर्तन एवं आभूषण खरीदना शुभ

कार्तिक माह के त्रियोदशी को मनाया जाता है धनतेरस

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कार्तिक माह के त्रियोदशी को मनाया जाता है धनतेरस जिले के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में धनतेरस को लेकर दुकानदारों ने तैयारी को अंतिम रूप दिया। लोगों ने भी धनतेरस की खरीददारी की रूपरेखा तैयार कर लिये है। कार्तिक मास की कृष्ण त्रियोदशी को धनतेरस मनाया जाता है। धनतेरस में नए बर्तन एवं आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन यमराज और भगवान धनवंतरी की पूजा का महत्व है। शास्त्रों में वर्णित कथाओं के मुताबिक समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रियोदशी के दिन भगवान धनवंतरी अपने हाथों में कलश लेकर प्रकट हुए थे। कहा जाता है कि देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गये। शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि से आग्रह किया कि वामन कुछ भी मांगे तो उन्हें इंकार कर देना। वामन साक्षत भगवान विष्णु है जो देवताओं के सहायता के लिए तुमसे सब कुछ लेने आये हैं। बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी और वामन भगवान द्वारा मांगी गयी तीन पग भूमि, दान करने के लिए कमंडल से जल लेकर संकल्प लेने लगे। बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में लघु रूप धारण कर के प्रवेश कर गये। इससे कमंडल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया। वामन भगवान शुक्राचार्य की चाल को समझ गए। भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुश को कमंडल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की आंख फुट गयी और कमंडल से वे बाहर निकल आए। इसके बाद बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया। तब भगवान वामन ने अपने एक पैर से सम्पूर्ण पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग से अंतरिक्ष एवं तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं रहने के कारण बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरण में रख दिया। बलि ने अपने दान में सब कुछ गवा बैठा। इस तरह बलि के भाई देवताओं को मुक्ति मिली। बलि ने जो धन सम्पत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुणा अधिक धन सम्पत्ति देवताओं को मिल गयी। इसी उपलक्ष्य में धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। झाड़ू खरीदने की रही है परम्परा:धनतेरस के दिन घर के लिए झाड़ू की भी खरीददारी की जाती है। मान्यता है कि झाड़ू ले जाने के बाद घर में उत्पन्न होने वाली दरिद्रता का नाश होता है। साथ ही झाड़ू स्वच्छता का प्रतीक है। स्वच्छ वातावरण में ही धन की देवी लक्ष्मी के आगमन के लिए लोग तैयारी करते हैं। स्रोत-हिन्दुस्तान

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