बिना नोटिस वाहन जब्त करने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, RBI से भी रिकवरी नियमों को प्रभावी ढंग से लागू कराने को कहा
नई दिल्ली। लोन की किस्तें समय पर नहीं चुकाने पर बैंक या फाइनेंस कंपनी द्वारा वाहन जब्त करने के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि लोन की वसूली के लिए वित्तीय संस्थाएं बल प्रयोग, धमकी या परेशान करने वाले तरीकों का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं।
मामला उत्तर प्रदेश के एक ट्रक मालिक से जुड़ा है। आरोप था कि रात करीब एक बजे कुछ लोग ट्रक का स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन ले गए। बाद में पता चला कि वाहन को फाइनेंस कंपनी ने जब्त कर बेच दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में फाइनेंस कंपनी को कुल लगभग 15 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। साथ ही RBI को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि वाहन रिकवरी से जुड़े उसके नियम वास्तविक रूप से लागू हों।
रात एक बजे ट्रक ले जाने का आरोप
मामला मार्च 2019 में लिए गए एक कमर्शियल वाहन लोन से शुरू हुआ था। ट्रक मालिक ने Tata का एक ट्रक खरीदा था और उसकी कीमत चुकाने के लिए फाइनेंस कंपनी से लोन लिया था।
लोन की अदायगी 75 मासिक किस्तों में होनी थी। बाद में 2021 में एक अतिरिक्त लोन भी लिया गया।
किस्तों के भुगतान में समस्या आने के बाद कंपनी ने पहले भी वाहन अपने कब्जे में लिया था। बाद में कुछ भुगतान करने और बकाया चुकाने के आश्वासन के बाद ट्रक वापस कर दिया गया।
इसके बाद फिर से भुगतान में चूक हुई।
ट्रक मालिक के अनुसार 9 अप्रैल 2023 की रात करीब एक बजे चार अज्ञात लोग उस स्थान पर पहुंचे जहां ट्रक खड़ा था। आरोप है कि उन्होंने स्टीयरिंग लॉक तोड़ा और ट्रक लेकर चले गए।
उसी दिन पुलिस में शिकायत
ट्रक मालिक ने वाहन गायब होने के बाद उसी दिन पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
कुछ महीने बाद उसे एक कानूनी नोटिस मिला, जिसमें बताया गया कि कंपनी ने अगस्त 2023 में ट्रक को 4.5 लाख रुपये में बेच दिया है।
कंपनी ने बिक्री की रकम को लोन की बकाया राशि में समायोजित किया और इसके बाद भी ट्रक मालिक से कुछ रकम बकाया होने की बात कही।
मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। ट्रक के नाम पर 2024 और 2025 तक ट्रैफिक चालान आते रहे, जबकि कंपनी के अनुसार वाहन 2023 में ही बेचा जा चुका था।
नोटिस क्यों महत्वपूर्ण था
सुप्रीम कोर्ट के सामने लोन एग्रीमेंट का एक महत्वपूर्ण प्रावधान भी आया।
रिपोर्ट के अनुसार समझौते में वाहन वापस लेने से पहले सात दिन का नोटिस देने की शर्त थी। लेकिन ट्रक मालिक का कहना था कि उसे ऐसा कोई नोटिस नहीं दिया गया।
कोर्ट ने इस प्रावधान और RBI के रिकवरी नियमों की रोशनी में मामले को देखा।
सवाल सिर्फ यह नहीं था कि लोन की किस्तें बकाया थीं या नहीं।
सवाल यह भी था कि बकाया लोन की वसूली के लिए फाइनेंस कंपनी किस तरीके का इस्तेमाल कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोन की वसूली कानून के मुताबिक होनी चाहिए।
बैंक या NBFC को बकाया रकम वसूलने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह ग्राहक का वाहन बलपूर्वक या मनमाने तरीके से उठा सकती है।
कोर्ट ने पहले के अपने फैसलों और RBI की रिकवरी संबंधी गाइडलाइंस का भी उल्लेख किया।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि वित्तीय संस्थानों को अपने रिकवरी एजेंटों की गतिविधियों के लिए भी जिम्मेदार रहना होगा।
कंपनी को कितना भुगतान करना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रक की बिक्री को उस स्थिति में वापस लेने का आदेश नहीं दिया क्योंकि वाहन पहले ही बेच दिया गया था।
इसके बजाय कंपनी को कई वित्तीय निर्देश दिए गए।
कंपनी को ट्रक की बिक्री से प्राप्त 4.5 लाख रुपये की राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करना होगा।
इसके अलावा मानसिक परेशानी और आजीविका के नुकसान के लिए 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया है।
कोर्ट ने 50 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भी देने को कहा है।
कुल मिलाकर भुगतान लगभग 15 लाख रुपये तक पहुंचता है।
दोनों लोन खातों को बंद करने का भी निर्देश दिया गया है।
RBI के लिए भी महत्वपूर्ण निर्देश
इस फैसले का सबसे बड़ा हिस्सा सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने RBI से कहा है कि वह यह सुनिश्चित करे कि वाहन जब्ती और लोन रिकवरी से जुड़े उसके नियम प्रभावी ढंग से लागू हों।
इसका महत्व इसलिए है क्योंकि RBI लंबे समय से बैंकों और NBFCs को रिकवरी एजेंटों के व्यवहार को लेकर निर्देश देता रहा है।
लेकिन अदालत के सामने यह मामला इस सवाल को लेकर आया कि अगर नियम मौजूद हैं तो उनका पालन कितनी प्रभावी तरीके से हो रहा है।
लोन लेने वालों के लिए क्या मतलब है
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि लोन की किस्त नहीं चुकाने पर फाइनेंस कंपनी वाहन कभी जब्त नहीं कर सकती।
अगर ग्राहक लोन की शर्तों का उल्लंघन करता है तो फाइनेंस कंपनी कानूनी प्रक्रिया के तहत वाहन वापस लेने की कार्रवाई कर सकती है।
लेकिन कार्रवाई कानून और अनुबंध की शर्तों के मुताबिक होनी चाहिए।
ग्राहक को धमकाना, बल प्रयोग करना या बिना निर्धारित प्रक्रिया के वाहन उठा लेना अलग मामला है।
यही अंतर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अगर आपकी EMI बकाया है तो क्या करें
अगर किसी व्यक्ति की वाहन लोन EMI बकाया है तो उसे नोटिस को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
फाइनेंस कंपनी से लिखित रूप में बकाया रकम और भुगतान की स्थिति पूछनी चाहिए।
किसी रिकवरी एजेंट द्वारा धमकी या जबरदस्ती की स्थिति में ग्राहक को उसकी जानकारी, कॉल रिकॉर्ड, संदेश और दूसरे उपलब्ध दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए।
जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता भी ली जा सकती है।
इस फैसले से बड़ी सीख
लोन लेने वाला ग्राहक अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
लेकिन दूसरी तरफ लोन देने वाली संस्था भी वसूली के लिए कानून से बाहर नहीं जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी संतुलन को सामने रखता है।
वित्तीय संस्थाओं के पास बकाया वसूलने के कानूनी अधिकार हैं, लेकिन ग्राहकों के अधिकार और गरिमा की रक्षा भी जरूरी है।
आपकी राय
अगर कोई व्यक्ति EMI नहीं चुका पा रहा है तो क्या फाइनेंस कंपनियों को पहले बातचीत और पुनर्गठन का विकल्प देना चाहिए?
और अगर रिकवरी एजेंट धमकी या जबरदस्ती करें तो उनके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए?
क्या आपके या आपके किसी परिचित के साथ लोन रिकवरी को लेकर ऐसा अनुभव हुआ है?
अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।












