नई दिल्ली। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision को लेकर चुनाव आयोग एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं। वहीं चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि आयोग के सभी निर्णय पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णय रहे हैं।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब बिहार में मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दल पहले से ही सक्रिय हैं।
क्या है पूरा मामला
Indian Express की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान कई मौकों पर आयोग की कुछ प्रक्रियाओं और प्रस्तावित कदमों पर आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट के अनुसार इन आपत्तियों में बिहार के SIR से जुड़े कुछ मुद्दे भी शामिल थे। रिपोर्ट में Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची से जुड़े डेटा और अधिकारियों की भूमिका जैसे विषयों पर आंतरिक स्तर पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये मीडिया रिपोर्ट में बताए गए आंतरिक विचार और आपत्तियां हैं। चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक बयान में इन घटनाओं की अलग व्याख्या दी है।
चुनाव आयोग ने क्या कहा
चुनाव आयोग ने कहा कि किसी भी संवैधानिक संस्था में निर्णय लेने से पहले सदस्यों की ओर से सवाल, सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग के मुताबिक SIR सहित पिछले एक वर्ष में लिए गए उसके सभी फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम हैं। आयोग ने यह भी कहा कि जिन टिप्पणियों और सुझावों का उल्लेख किया जा रहा है, वे मुख्य रूप से मसौदा स्तर की प्रक्रिया से संबंधित थे।
आयोग ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि किसी प्रस्ताव के मसौदे पर सवाल या सुझाव दिया जाना और अंतिम निर्णय पर असहमति होना एक ही बात नहीं है।
SIR क्यों महत्वपूर्ण है
Special Intensive Revision का सीधा संबंध मतदाता सूची से है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची में योग्य मतदाताओं का विवरण सुनिश्चित करना और सूची को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपडेट करना है।
बिहार में SIR की प्रक्रिया पहले ही व्यापक राजनीतिक बहस का विषय रही है। मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटने या सुधार से जुड़े मामलों का सीधा असर मतदाताओं के मतदान अधिकार पर पड़ सकता है।
इसी वजह से राजनीतिक दल और नागरिक संगठन इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और दस्तावेजी प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं।
विपक्ष ने उठाए सवाल
आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
बिहार कांग्रेस ने पटना में प्रदर्शन करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग की। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि दूसरे चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया और SIR से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता नहीं रही। ये विपक्षी नेताओं के राजनीतिक आरोप हैं।
अन्य विपक्षी दलों ने भी चुनाव आयोग की भूमिका और SIR की प्रक्रिया को लेकर जांच की मांग की है। कुछ नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग तक की है।
आयोग के पक्ष को भी समझना जरूरी
इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
आयोग का कहना है कि किसी प्रस्ताव के ड्राफ्ट चरण में अधिकारियों या आयुक्तों द्वारा सवाल उठाना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने कहा कि अंतिम आदेश और निर्णय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार और पूर्ण आयोग की मंजूरी से जारी किए गए।
इसलिए मौजूदा विवाद को समझने के लिए दो अलग पहलुओं को अलग रखना जरूरी है।
पहला, क्या आंतरिक स्तर पर सवाल और आपत्तियां उठाई गई थीं।
दूसरा, क्या उन आपत्तियों के बावजूद अंतिम निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया और पूर्ण आयोग की सहमति से लिए गए।
मीडिया रिपोर्ट और आयोग के आधिकारिक बयान इन दोनों पहलुओं को अलग-अलग तरीके से सामने रखते हैं।
बिहार में इसका राजनीतिक असर
बिहार में SIR का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि मतदाता सूची से जुड़े फैसले चुनावी प्रक्रिया के आधार को प्रभावित करते हैं।
आने वाले दिनों में राजनीतिक दल इस मुद्दे को जनता के बीच ले जा सकते हैं। वहीं चुनाव आयोग के लिए पारदर्शिता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब देना महत्वपूर्ण रहेगा।
इसके साथ ही बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू होने वाली है। इन सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान और 27 अक्टूबर को मतगणना होनी है।
अब नजर आगे की कार्रवाई पर
फिलहाल चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक बयान में सभी अंतिम फैसलों को सर्वसम्मत बताया है। दूसरी ओर विपक्षी दल आंतरिक मतभेदों की रिपोर्ट को आधार बनाकर आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।
ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा और चर्चा में रह सकता है। खासकर SIR, मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े किसी भी नए दस्तावेज या आधिकारिक बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया आने की संभावना है।
मतदाताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि वे अपने नाम और विवरण को आधिकारिक मतदाता सूची में जांचते रहें और किसी भी त्रुटि की स्थिति में निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से सुधार के लिए आवेदन करें।
Seemanchal Live इस मामले में चुनाव आयोग के आधिकारिक फैसलों और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं पर नजर बनाए रखेगा।












