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नारी के खिलाफ हो रहे अपराधों पर लगाम लगना ही सच्ची दुर्गा पूजा

नारी के खिलाफ हो रहे अपराधों पर लगाम लगना ही सच्ची दुर्गा पूजा . प्रदीप कुमार नायक असत्य पर सत्य का प्रतीक दूर्गा पूजा के शुभ अवसर पर यह लेख मुज़फ़्फ़रपुर निवासी पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़ी भावना नायक ने लिखी हैं। उन्होंने इस लेख के जरिये सच्ची बात कही है कि नारी के खिलाफ हो रहे अपराधों पर लगाम लगाना ही

नारी के खिलाफ हो रहे अपराधों पर लगाम लगना ही सच्ची दुर्गा पूजा
नारी के खिलाफ हो रहे अपराधों पर लगाम लगना ही सच्ची दुर्गा पूजा . प्रदीप कुमार नायक असत्य पर सत्य का प्रतीक दूर्गा पूजा के शुभ अवसर पर यह लेख मुज़फ़्फ़रपुर निवासी पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़ी भावना नायक ने लिखी हैं। उन्होंने इस लेख के जरिये सच्ची बात कही है कि नारी के खिलाफ हो रहे अपराधों पर लगाम लगाना ही सच्ची दूर्गा पूजा होगी। नवरात्रि हिंदुओं का एक प्रमुख पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र आ गई है। उत्तर भारत में नौ दिन चलने वाले इस पर्व को स्त्री शक्ति सम्मान के रूप में मनाया जाता है। यह देखना भी दिलचस्प है कि जहां साल में दो बार लड़कियों को महत्व देने के लिए ऐसे पर्व मनाए जाते हों, वहां लड़कियों को दोयम दर्जे का मानने वाले भी बहुत हैं। नवरात्रि मात्र त्यौहार का पुजा नही है बल्कि नारी शक्ति का महत्व समझकने का अवसर है।माँ दुर्गा के नव रूप ,स्त्री के नौ कलाओं के परिचायक है। माँ भवानी अपने जिन रूपो में वंदनीय है,आज के स्त्री में भी वही वही सृजन,पालन।और संस्कार ही अभूतपूर्व शक्ति है।आज संसार मे स्त्रियों के प्रति अत्याचार,व्याविचार और दुराचार बढ़ रहे है।स्त्रियों को इन सब का सामना करने के लिए स्वयं को सुदृढ़ करना होगा और स्त्रियां बहुत दृढ़ता से सामना कर भी रही है।भ्रूण,हत्या,दहेज,हिंसा,बलात्कार से मुक्त समाज ही माँ दुर्गा की असली पूजा होगी एवं भयमुक्त नारी ही माँ दुर्गा की असली आराधक होगी।आज स्त्री ने स्वयम को साबित किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2015 में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की थी। तब आंकड़े बताते थे कि लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या देश में सबसे कम थी। फिर लड़कियों को ही केंद्र में रखकर दंगल फिल्म बनाई गई थी। उसके बाद यहां महिला के लिए बहुत से अखाड़े खुल गए थे। साल 2012 में हरियाणा की वीवीपुर पंचायत के बारे में खबर आई थी कि वे अब लड़कियों को बचाने की पहल करेगी। यहां एक बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें आसपास के गांवों की सौ खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।तब से अब तक न जाने कितनी बातें और घटनाएं ऐसी हुई हैं, जो देश में लड़कियों के प्रति बदलती सोच को बता रही हैं। बड़ी संख्या में छोटे शहरों और गांवों की लड़कियां पढ़-लिखकर अपनी जगह बना रही हैं। वे उन क्षेत्रों में जा रही हैं, जहां उनके जाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। वे टैक्सी, बस, ट्रक से लेकर जेट तक चला-उड़ा रही हैं। अपने दम पर व्यवसायी बन रही हैं। हम राष्ट्रीय पुत्री दिवस मानते है हालांकि, भारत में बेटी दिवस मनाने की एक खास वजह बेटियों के प्रति लगातार बढ़ रहे अपराधों पर नियंत्रण के लिये लोगों को जागरूक करना है। आज भी हमारे समाज की सोच बेटियों को लेकर विडम्बनापूर्ण एवं विसंगतिपूर्ण है। बेटी को न पढ़ाना, उन्हें जन्म से पहले मारना, घरेलू हिंसा, उनके मासूम शरीर को नौंचना, दहेज और दुष्कर्म से जुड़े बेटियों के अपराध एवं अत्याचार होना नये भारत, विकसित भारत पर एक बदनुमा दाग है। यह समझाना जरूरी है कि बेटियां बोझ नहीं होतीं, बल्कि आपके परिवार, समाज एवं राष्ट्र का एक अहम हिस्सा होती हैं, एक बड़ी ताकत होती हैं। आज बेटियां चांद तक पहुंच गई हैं, कोई भी क्षेत्र हो बेटियों ने अपना दमखम दिखा दिया है और बता दिया है कि वे किसी से कम नहीं हैं। इस सबके बावजूद बेटियों को क्यों अपनी हवस का माध्यम बनाया जाता है, यह एक बड़ा प्रश्न नवरात्र जैसे पर्व मनाते हुए हमारे सामने खड़ा है। बेटियों एवं नारी के प्रति यह संवेदनहीनता कब तक चलती रहेगी? भारत विकास के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी कई हिस्सों में बेटियों को लेकर गलत धारणा है कि बेटियां परिवार पर एक बोझ की तरह हैं। एक विकृत मानसिकता भी कायम है कि बेटियां भोग्य की वस्तु हैं? भारत में आज से कुछ वर्षों पहले के लिंगानुपात की बात करें तो लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी और गर्भ में बेटियों को मारने का चलन चल पड़ा था। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में इस सोच में भारी परिवर्तन भी हुआ है। ज्यों-ज्यों शिक्षित और रोजगारशुदा लड़कियों की संख्या बढ़ी है, उनकी आवाज और ताकत को नेता भी पहचानने लगे हैं। हर राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में औरतों के हितों की बातें करने लगा है। महिला नेताओं ने भी बेटियों एवं नारी की स्थिति बदलने में बहुत सकारात्मक भूमिका निभाई है। आजाद भारत के 75 साल के इतिहास में पिछले डेढ़ दशक को महिलाओं के लिए खास तौर से विशिष्ट माना जा सकता है। जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने वाली महिलाएं इस दौरान देश के शीर्ष संवैधानिक पद तक पहुंचने में कामयाब रहीं और 2007 में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनने का गौरव हासिल करने के बाद अब हाल ही में द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना देश की लोकतांत्रिक परंपरा की एक सुंदर मिसाल है।

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